उत्तर प्रदेश

Lokayukt: भ्रष्टों में नहीं रहा लोकायुक्त का खौफ!

निष्प्रयोज्य रहा लोकायुक्त संजय मिश्रा का 8 साल का कार्यकाल

Lokayukt: उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त संगठन ने एक दौर में राजनीति का रंग बदला, अफसरो, मंत्रियों, विधायकों के भ्रष्टाचार की कलई खोली। कई मंत्रियों, विधायकों को पद, नगर पालिका, जिला पंचायत अध्यक्षों को पद छोड़ना पड़ा। कई अफसरों को निलंबित और कुछ को प्रतिकूल प्रविष्टि मिली। लोकायुक्त संगठन की इस लोकप्रियता पर भाजपा 2017 के चुनावी घोषणा पत्र में लोकायुक्त संगठन को और बेहतर बनाने का वादा किया। लेकिन नौ साल बाद भी इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। जनता भी लोकायुक्त संगठन को भूलने लगी है। कितना चमकदार था लोकायुक्त (Lokayukt) संगठन का अतीत और कैसे थरथराते थे भ्रष्टाचारी और कैसे धीरे धीरे गुमनाम हो गई यह संस्था। श्रंखला की शुरूआत…।

परवेज़ अहमद

लखनऊ। लोकायुक्त जांच का आदेश। लोकायुक्त ने शिकायत का संज्ञान लिया। ये दो वाक्य ऐसे थे, जिसे सुनते ही माफिया, नौकरशाह, विधायक, मंत्री, जिला पंचायत अध्यक्ष, पालिका अध्यक्ष और लोकसेवक थर-थरा उठते थे। न वकील, न पैरोकार की जरूरत थी। परिवाद दाखिल कीजिए, साक्ष्य परीक्षण और फिर जांच शुरू। परिवादी को समयबद्धता के साथ पूरी जानकारी रहती थी। 31 जुलाई 2016 को न्यायमूर्ति संजय मिश्र के लोकायुक्त (Lokayukt) पद संभालने के बाद इस संस्था पर गोपनीयता का आवरण चढ़ गया। फरियादियों को वकीलों की जरूरत पढ़ने लगी। धीरे-धीरे नागरिक भी भूल गये कि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने का एक माध्यम लोकायुक्त भी है। साथ ही लोकायुक्त संस्था को मजबूत करने की घोषणा करने वाली भाजपा सरकार भी भूल गई कि उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त का कार्यकाल बीत चुका है, शासनादेश की एक तकनीकी बिन्दु-‘’नये की नियुक्ति तक पद पर बने रहने का फायदा लोकायुक्त और उपलोकायुक्त को मिल रहा है।‘’

भ्रष्टों पर कार्रवाई में टालमटोल

उत्तर प्रदेश में लोकायुक्त अधिनियम-1975 में बना था। सर्तकता विभाग इसका प्रशासकीय विभाग था। जिसकी नियमावली 1977 में बनी। 1981 में लोकायुक्त की सेवा शर्तें तैयार हुईं। इसमें लोकायुक्त का कार्यकाल छह साल होता था। इसके बाद लोकायुक्तों की नियुक्ति शुरू हुई। परिवाद दाखिल भी होने लगे। कार्रवाई भी होने लगी। लोकायुक्त कार्यालय आम जनता के लिये खुला रहता था, कोई भी परिवादी परिवाद दाखिल कर सकता था, इसके लिए उसे निर्धारित शुल्क के साथ शपथ पत्र और आरोपों के समर्थन में साक्ष्य दाखिल करना होता था। लोकायुक्त एक तरह से खुली जांच करते थे, दोनों पक्षों से साक्ष्य लिये जाते थे। कभी-कभी लोकायुक्त अपने आधानी अन्वेषण अधिकारियों से जांच करा लेते थे। जांच के निष्कर्ष के आधार पर लोकायुक्त व उपलोकायुक्त अपनी संस्तुतियों से समेत जांच रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपते थे, जहां से मुख्यमंत्री को भेजी जाती थी। सामान्य तौर पर सभी पर कार्रवाई हो जाती थी।

पूर्व लोकायुक्त की कार्रवाई से थर्राते थे भ्रष्ट

15 मार्च 2006 को यूपी सरकार ने न्यायमूर्ति एनके मेहरोत्रा को लोकायुक्त नियुक्त किया। कार्यभार संभालते ही एनके मेहरोत्रा ने लोकायुक्त व उपलोकायुक्त के कार्यालय को आम जनता के लिए खोल दिया। कार्यशैली को पारदर्शी कर दिया। परिवाद का प्रारम्भिक अन्वेषण एक सप्ताह में पूरा कराने की समय सीमा निर्धारित कर दी। लोकायुक्त अधिनियम की धाराओं का उपयोग करते हुए उन्होंने संबंधित विभागों, अधिकारियों, लोकसेवकों को नोटिस जारी कर जवाब मांगना शुरू कर दिया। नोटिसों की प्रति बोर्ड पर टंगवाना शुरू किया। जिससे भ्रष्टाचार के खिलाफ परिवाद की बाढ़ आ गई। परिवाद का शुल्क 1500 और शपथ पत्र भी लिया जाता था, फिर भी शिकायतें बढ़ने लगीं। कार्रवाई भी होने लगी। लोकायुक्त संगठन की लोकप्रियता चरम पर पहुंच गई। नागरिकों में यह विश्वास होने लगा कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक संस्था ऐसी है जहां बिना, वकील, सिफारिश सुनवाई होती है।

सपा सरकार ने लोकायुक्त का बढ़ाया था कार्यकाल

इस बीच उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बन गई। सत्ता संभालते ही अखिलेश यादव सरकार ने 6 जुलाई 2016 को पहली कैबिनेट में ही लोकायुक्त और उपलोकायुक्त का कार्यकाल छह साल से बढ़ाकर आठ साल कर दिया। साथ यह प्राविधान भी कर दिया कि कार्यकाल खत्म होने के बाद नये लोकायुक्त व उपलोकायुक्त की नियुक्ति होने तक लोकायुक्त पूरी शक्तियों के साथ अपने पद पर काम करता रहेगा। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक याचिका पर सुनवाई और निर्देश के बाद लोकायुक्त पद पर न्यायमूर्ति संजय मिश्र की नियुक्ति हुई, जिन्होंने पद संभालने के बाद से ही लोकायुक्त संस्था पर गोपनीयता का पर्दा डाल दिया। 2016 तक लोकप्रियता के चरम पर पहुंच चुकी इस संस्था को लोक भूलने लगे हैं। आलम यह है कि उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त (Lokayukt) संजय मिश्र का कार्यकाल पूरा हो चुका है लेकिन उत्तर प्रदेश की सरकार का न इस ओर ध्यान है और न ही अब तक कोई प्रयास है। जनता के जेहन से भी संस्था उतर गई है लिहाजा विपक्ष भी इस ओर से बेपरवाह है।

मौजूदा समय में लोकाय़ुक्त

-न्यायमूर्ति संजय शर्मा,

हाईकोर्ट के सेवानिवृत न्यायमूर्ति 2016 से अब तक यूपी के लोकायुक्त

उपलोकायुक्त

शंभू सिंह यादव

यूपी की प्रांतीय प्रसाशनिक सेवा के अधिकारी। आईएएस में प्रोन्नत होकर अखिलेश यादव सरकार में मुख्यमंत्री के विशेष सचिव रहे। रिटायर होते ही अखिलेश यादव ने उपलोकायुक्त बना दिया। तब से अब तक कार्यरत।

सुरेन्द्र कुमार यादव

लखनऊ में जिला एवं सत्र न्यायाधीश रहे। दुनिया के सबसे चर्चित केस अयोध्या में बाबरी ढांचा गिराने के आरोपियों लालकृषण आडवानी, उमा भारती को बाइज्जत बरी करने का फैसला सुनाया। सेवानिवृत होने के बाद 12 अप्रैल 2021 यूपी सरकार ने उन्हें लोकायुक्त नियुक्त किया। कार्यकाल बाकी है।

दिनेश कुमार सिंह

न्यायिक अधिकारी थे। उत्तर प्रदेश सरकार के प्रमुख सचिव न्याय रहे। किसी भी सरकार के लिए यह पद सबसे अहम होता है। वहां से सेवानिवृत होने के बाद 6 जून 2020 को यूपी सरकार ने उन्हें उपलोकायुक्त (Lokayukt) नियुक्त किया है। तब से वह इस पद पर हैं। कार्यकाल बाकी है।

यह भी पढ़े: Dalit Atrocity: योगी की दलित विरोधी छवि गढऩे में लगे हैं कुछ आईएएस

इ-पेपर : Divya Sandesh

 

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