परवेज अहमद
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के भ्रष्ट लोकसेवकों में खौफ भरने वाले लोकायुक्त पद पर न्यायमूर्ति संजय मिश्र के काबिज होने से पहले लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा को पद से हटाने की लंबी कानूनी लड़ाई हुई। जिसमें राज्यपाल, इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, नेता प्रतिपक्ष, भाजपा और दूसरे छोटे दलों के नेता भी कानून के दायरे में नया लोकायुक्त चाहते थे। आखिर भारत के सीजेआई रहे न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की पीठ के आदेश पर न्यायमूर्ति संजय मिश्र लोकायुक्त नियुक्त हुये और उनकी तैनाती होने के साथ ही लोकायुक्त (Lokayukta) की जांचों की रफ्तार धीमी होने लगी। खौफ खत्म होने लगा और अब नौवें साल में यूपी के नागरिक यह भूल गये हैं कि लोकायुक्त संगठन भी कोई जांच एजेंसी है।
लोकायुक्त संगठन अधिनियम की मंशा ही यही थी कि अदालतों की दौड़भाग, सरकारी एजेंसियों के मकड़जाल से इतर गरीब व्यक्ति भी बिना किसी पैरोकार, वकील, सिफारिश के लोकसेवक के खिलाफ परिवाद दाखिल कर सके और उसके बारे में जानकारी हासिल कर सके। पर, एनके मेहरोत्रा की विदाई के साथ ही संस्था की साख जनता की नजरों से ओझल हो गई। नियमों के मुताबिक प्रतिवर्ष लोकायुक्त का प्रतिवेदन राज्यपाल को भेजे जाने के बाद उसे वेबसाइट पर डाल दिया जाए, ताकि कोई भी व्यक्ति परिवाद और संस्तुतियों को देख सके। लेकिन लोकायुक्त (Lokayukta) संगठन की बेवसाइट गवाह है कि 2014 के बाद लोकायुक्त की संस्तुतियों का ब्यौरा आन लाइन नहीं किया गया। छठवें लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा का कार्यकाल पूरा होने के बाद सातवें लोकायुक्त की नियुक्ति के लिए कानूनी संघर्ष हुआ। जिसमें सत्ता व सांविधानिक पदों के शीर्ष लोगों ने विविध तर्क से साथ पेंच खड़े किये। जिसके बाद न्यायमूर्ति संजय मिश्र लोकायुक्त नियुक्त हुए, जिनका कार्यकाल खत्म हो गया है। लेकिन नियमों नई नियुक्ति तक पद पर बने रहने की व्यवस्था के चलते वह पद कार्यरत रहेंगे।
सूत्रों का कहना है कि लोकायुक्त (Lokayukta) संगठन में अब सिर्फ वही लोग जाते हैं, जिन्हें कानून की जानकारी है। सियासी और कानूनी रूप से जागरूक हैं। मगर, उनकी शिकायतों का परिणाम क्या हुआ, इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है। इस संबंध में लोकायुक्त कार्यालय से संपर्क का प्रयास किया गया, मगर कोई भी इस दिशा में बात करने को उपलब्ध नहीं हुआ।
कुछ ऐसे बने न्यायमूर्ति संजय़ मिश्र लोकायुक्त
प्रदेश के पहले लोकायुक्त के रूप में न्यायमूर्ति विशंभर दयाल ने 14 सितंबर 1977 को कार्यभार संभाला। उनके बाद न्यायमूर्ति मिर्जा मोहम्मद मुर्तर्ज हुसैन, जस्टिस कैलाश नाथ गोयल, न्यायमूर्ति राजेश्वर सिंह व न्यायमूर्ति सुधीर चंद्र वर्मा लोक आयुक्त रहे। न्यायमूर्ति एनके मेहरोत्रा ने छठवें लोकयुक्त के रूप में 16 मार्च 2006 को पद संभाला था। अब न्यायमूर्ति संजय मिश्र सातवें लोकायुक्त हैं।
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अखिलेश यादव ने लोकायुक्त की उम्र सीमा खत्म की
उत्तर प्रदेश लोकायुक्त एवं उपलोकायुक्त अधिनियम-1975 में बना था। जिसमें लोकायुक्त व उपलोकायुक्त का कार्यकाल छह साल था। लोकायुक्त को लोकसेवकों केपद के दुरुपयोग, भ्रष्टाचार की जांच का अधिकार है। साथ ही जांच में हासिल तथ्यों के साथ संस्तुतियां राज्य सरकार को भेजने का अधिकार है। किसी को दोषी या निर्दोष घोषित करने का लोकायुक्त (Lokayukta) को अधिकार नहीं है। सिर्फ साक्ष्य के आधार पर कार्रवाई व विशेषज्ञ जांच कराने की संस्तुति करने का अधिकार है। तीन माह में कार्रवाई नहीं होने पर राज्यपाल को स्पेशल रिपोर्ट भेजने की भी अधिनियम में व्यवस्था है। वर्ष 2012 में अखिलेश यादव सरकार ने इस अधिनियम में पहला संशोधन किया। इसमें अधिकारों में कोई कटौती या बढ़ोत्तरी नहीं की गयी। अलबत्ता लोकायुक्त एवं उपलोकायुक्त का कार्यकाल छह से बढ़ाकर आठ साल कर दिया। अखिलेश सरकार ने अधिनियम का सेक्शन 5(3) भी संशोधित कर दिया था, जिससे कार्यकाल पूरा करने वाला व्यक्ति दोबारा नियुक्ति के लिए अर्ह हो गया। उम्र की बाध्यता भी खत्म हो गयी।
लोकायुक्त में शिकायत का तरीका
कोषागार में दो हजार रुपए की राशि जमा करनी होती है। इसके अलावा मुफ्त मिलने वाली एक पुस्तिका पर बने फार्म के प्रारूप में तीन प्रतियां लोकायुक्त (Lokayukta) कार्यालय में जमा करनी होती है। इसके साथ नोटरी से सत्यापित हलफनामा देना होता है, जिसमें शिकायत कर्ता का नाम, पता, फोन नम्बर के साथ आरोपों का ब्यौरा दर्ज किया जाता है। इल्जामों के समर्थन में साक्ष्य की सत्यापित प्रति लगायी जाती है। इस पर लोकायुक्त शिकायतकर्ता को बुलाकर उसका कथन (बयान) दर्ज करते हैं। प्रारम्भिक परीक्षण के बाद परिवाद दर्ज कर अन्वेषण (जांच) शुरू करते हैं। शिकायत के समर्थन में साक्ष्य वादी को उपलब्ध कराने होते हैं।
निष्पक्ष दिव्य संदेश की घोषणा
लोकायुक्त संगठन से उनका पक्ष जानने के लिए संपर्क किया गया। मगर कोई भी उत्तर देने के लिए उपलब्ध नहीं हो सका। निष्पक्ष दिव्य संदेश घोषणा करता है कि जब भी लोकायुक्त (Lokayukta) संगठन की ओर से लिखित या मौखिक पक्ष उपलब्ध करायेगा, उसे प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
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