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पॉवर के खेल में दल टूटे और रिश्ते छूटे

महाराष्ट्र में ठाकरे परिवार में भी हो चुकी है टूटन

  • महाराष्ट्र में ठाकरे परिवार में भी हो चुकी है टूटन
  • आन्ध्रप्रदेश में दामाद ने ही ससुर को कर दिया पैदल
  • चाचा-भतीजे की जंग में लोजपा में भी हो चुकी टूट
  • हरियाणा में इनेलों टूटी तो बनी जननायक जनता पार्टी

योगेश श्रीवास्तव 

maharashtra news : लखनऊ। राजनीति में अपने अपनों को बढ़ाने में दलों के साथ रिश्ते भी टूटे। हाल ही मेंमहाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने पार्टी के तीस विधायकों को लेकर शिंदे सरकार में शामिल हो गए। सरकार में शामिल होने के  बाद अब उनका दावा पार्टी पर दावेदारी को लेकर है। महाराष्ट्र में एनसीपी के ५४ विधायक है जिनमें से तीस अजित पवार के पास बताये जा रहे है। अब देखना यह होगा कि एनसीपी की दावेदारी में चाचा भतीजे के बीच छिड़ी जंग में कामयाबी किसे मिलती है। हालांकि अपने अपनों को बढ़ानें के फेर में दलों के दो फाड़ होने साथ रिश्ते भी तीन तेरह हो गए है।

महाराष्ट्र में यह पहली घटना नहीं है। ठाकरें परिवार में यह दो बार हो चुका है।  देश के दूसरे राज्यों में इस तरह के कई उदाहरण है जहां राजनीतिक विरासत की जंग में घर में ही तलवारे खिंची। विरासत के साथ पार्टियां भी दो फाड़ हुई। जो दल इसके शिकार हुए वे आज भी अलग-अलग राह पर चल रहे है। कोई सत्तारूढ़ दल के साथ है तो कोई विपक्ष की राजनीति कर रहा है। महाराष्ट्र में एनसीपी से टूटे बड़े धड़े का नेतृत्व पांचवी बार डिप्टी सीएम बने अजित पवार कर रहे है। बड़ी टूट के बाद अब अजित पवार की मंशा तीस विधायकों को साथ लेकर खुद को असली एनसीपी साबित करने की है। महाराष्ट्र की राजनीति में यह कोई नया खेल नहीं है। इससे पहले शिवसेना में इसी तरह का खेल हो चुका है।

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महाराष्ट्र की राजनीति में नया नहीं एनसीपी से पहले यही सब बाल ठाकरें के नेतृत्ववाली शिवसेना में भी हो चुका है। जब १९६६ में बनी शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने अपने पुत्र उद्वव ठाकरें को आगे किया जो इससे नाराज होकर उनके सगे भतीजे राजठाकरें ने ९ मार्च २००६ महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना नाम से नई पार्टी बनाई और अब इसी का नेतृत्व कर रहे है। शिवसेना की टूट यहीं नहीं रूकी। जब उद्वव ठाकरे कांग्रेस और एनसीपी को साथ लेकर वहां के सीएम बने तो उन्होंने अपने पुत्र आदित्य ठाकरें को तवज्जों देना शुरू किया तो पार्टी में विरोध के स्वर मुखर होने लगे। उनकी सरकार में मंत्री रहे एकनाथ शिंदे विधायकों के एक बड़े धड़े को लेकर बगावत की और भाजपा के सहयोग से सीएम बन गए। यहीं नहीं शिवसेना के दो फाड़ हो गए। एक का नेतृत्व उद्वव ठाकरे कर रहे है जबकि दूसरे की कमान स्वयं एकनाथ शिंदे संभाल रहे है।

तेदेपा: अपने ही परिवार की बगावत में हारा सुपरस्टार

1982 में तेलुगू सुपरस्टार एनटी रामाराव ने तेलुगू देशम पार्टी गठन किया। पार्टी में कलह और गुटबाजी की शुरुआत 1993 में हुई। जब एनटीआर ने लक्ष्मी पार्वती से शादी की। कहा जाता है कि एनटीआर पर्वती को ज्क्च् का नेतृत्व संभालने के लिए तैयार कर रहे थे। एनटीआर के इस फैसले का पार्टी में विरोध शुरू हो गया। 1994 में हुए चुनाव के बाद टीडीपी ने लेफ्ट के साथ गठबंधन सरकार बनाई। उस वक्त तक गुटबाजी बहुत बढ़ चुकी थी। 1995 में एनटीआर को अपने दामाद और पार्टी के कद्दावर नेता एन चंद्रबाबू नायडू का विद्रोह झेलना पड़ा। टीडीपी के ज्यादातर सदस्य नायडू के साथ थे। इनमें एनटीआर के बेटे भी शामिल थे। सितंबर आते-आते एनटीआर के हाथ से सत्ता और पार्टी दोनों निकल गईं। एक सितंबर 1995 को चंद्रबाबू नायडू पार्टी के नेता बने। उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री के दौर पर शपथ ली। वहीं एनटीआर के धड़े को टीडीपी (एनटीआर) के नाम से जाना गया। 1996 में एनटीआर का निधन हो गया। एनटीआर की पत्नी पार्वती टीडीपी (एनटीआर) की नेता बनीं। धीरे-धीरे इस पार्टी का अस्तिव समाप्त हो गया और पार्वती कांग्रेस में शामिल हो गईं।

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लोजपा:चाचा ने की बगावत भतीजे से छीनी पार्टी

लोकजनशक्ति के प्रमुख रामविलास पासवान केंद्र की राजनीति में सक्रिय थे। वही उनके भाई पशुपतिपारस बिहार के प्रदेशाध्यक्ष थे। रामविलास के अस्वस्थ्य होने के बाद उनके पुत्र चिराग पासवान ने कमान अपने हांथ में ले ली। पशुपति पारस को पद से हटाने के बाद चाचा भतीजे के रिश्तों में तल्खी आई। रामविलास के निधन के बाद पार्टी दो फाड़ हुई।  इसी के बाद दोनों के बीच की खाई बढऩे लगी। जून 2021 आते-आते पशुपति पारस ने पार्टी के छह में पांच सांसदों को अपने साथ मिलाकर चिराग से संसदीय दल के पद और पार्टी की कमान दोनों ही छीन ली। पशुपति पारस अब केंद्र में मंत्री हैं। लोजपा का नाम पशुपति पारस गुट को मिला। वहीं चिराग अब लोजपा (रामविलास) के नेता हैं।

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उत्तराधिकार को लेकर अपना दल भी हो चुका दो फाड़ 

केन्द्र और प्रदेश की सरकार में शामिल अपना दल भी वर्चस्व की जंग में दो फाड़ हो चुका है। अपना दल की स्थापना डा.सोने लाल पटेलने की थी। उनके निधन के बाद उनकी पत्नी कृष्णा पटेल ने पार्टी की बागडोर संभाली। भाजपा द्वारा कृष्णा पटेल से पूछे बिना अनुप्रिया को मंत्री बनाए जाने से अपना दल में विद्रोह जैसी स्थिति बनी। अनुप्रिया पटेल अपनी मां कृष्णा पटेल का साथ देने के बजाए भाजपा नेतृत्व के साथ खड़ी नजऱ आई। उनके इस फैसले से खफ ा कृष्णा पटेल ने अपनी दूसरी पुत्री पल्लवी पटेल को आगे किया। आज की तारीख में अपना दल दो ख्ेामों बटा है अपना दल(एस) का नेतृत्व अनुप्रिया पटेल और अपना दल(के) का नेतृत्व कृष्णा पटेल कर रही है।

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इनेलों भी हुआ दो फाड़:

हरियाणा की सियासत में देवीलाल परिवार का खासा दखल रहा है। लेकिन यहां भी आपसी कलह ने सब कुछ तीन तेरह कर दिया है। देवीलाल के पुत्र ओमप्रकाश चौटाला भी सीएम हुए जो अपने पुत्र अजय चौटाला के साथ भ्रष्टाचार के एक मामलें में जेल में भी रहे। अजय चौटाला और स्वयं जेल में होने के कारण  इंडियन नेशनल लोकदल की कमान ओमप्राकाश चौटाला ने अपने दूसरे पुत्र अभय चौटाला को दी। चौटाला ने अक्टूबर १९९६ में इनेलो का गठन किया था। यहां भी चाचा भतीजे की नहीं बनी तो अजय चौटाला के पुत्र और अभय चौटाला के भतीजे दुष्यंत चौटाला ने ९ दिसंबर २०१८ को जननायक जनता पार्टी का गठन किया और दस विधायक जितवाकर इस समय खट्टर सरकार में डिप्टी सीएम बने हुए है। –

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सपा में कभी हां कभी ना 

बात 2016 की है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव को चंद महीने बचे थे। राज्य में समाजवादी पार्टी की सरकार थी। पार्टी संस्थापक मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश यादव राज्य के मुख्यमंत्री थे। उनकी सरकार में मंत्री और चाचा शिवपाल यादव ने अखिलेश के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। इसकी परिणीत यह हुई कि २०१७ के विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा और मुलायम के जीतेजी सपा दो फाड़ हो गयी और शिवपाल प्रसपा ने दूसरी पार्टी बनाई हालांकि मुलायम के निधन के बाद उन्होंने पार्टी का फिर सपा में विलय भी कर लिया। हालांकि विलय से पहले २०२२ के विधानसभा चुनाव में शिवपाल अखिलेश के महागठबंधन का हिस्सा थे।


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