लखनऊ। उत्तर प्रदेश की नौकरशाही में पूर्व आईएएएस डॉ.नवनीत कुमार सहगल एक ऐसे अधिकारी के रूप में पहचाने जाते हैं, जिनकी प्रशासनिक उपयोगिता सत्ता परिवर्तन के साथ खत्म नहीं हुई, बल्कि उनके काम करने की तरीके, मेहनत, कार्यकुशलता के कारण उपयोगिता और अधिक मजबूत होती गई। समाजवादी आंदोलन से लेकर बहुजन राजनीति, युवा टेक्नोके्रसी और सख्त प्रशासनिक मॉडल तक चार अलग-अलग शासनकालों के बाद भी उनका नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नीति-तंत्र तक स्वीकार्य बना रहना अपने आप में एक असाधारण प्रशासनिक उदाहरण है।
उत्तर प्रदेश के रिटायर्ड आईएएस अधिकारी और प्रसार भारती के चेयरमैन नवनीत सहगल ने पद से 2 दिसम्बर 2025 को अचानक इस्तीफा दे दिया है। केंद्र सरकार ने उनका इस्तीफा स्वीकार भी कर लिया है। उन्हें तत्काल प्रभाव से मुक्त कर दिया गया है। इस संबंध में आदेश भी जारी हो गया है। पूर्व आईएएस डा. नवनीत सहगल साल 2024 मार्च महीने में प्रसार भारती के चेयरमैन बने थे। प्रसार भारती के अध्यक्ष पद से अचानक इस्तीफा देने से राजनीतिक और नौकरशाही में भूचाल आ गया। जबकि उनके पास अभी लगभग लगभग एक साल का कार्यकाल बाकी था। इस तरह का अचानक इस्तीफा बिना किसी स्पष्ट वजह के होने से ही मीडिया में अटकलों और सवालों का बाजार गर्म हो गया है। एक पोर्टल ने डा. सहगल पर आरोपों की खबर चलाई जिसका उन्होंने प्रतिवाद किया और मानहानि का नोटिस दिया जिसके बाद से तमाम छोटे-छोटे मीडिया हाउस के कुछ असंतुष्टï प्रतिनिधियों ने अफवाहों को जमकर फैलाने में अहम भूमिका निभाई।
अचानक इस्तीफे और बगैर किसी कारण के गर्म हुआ अफवाहों का बाजार
आपको बताते चलें कि केन्द्र सरकार या डा. सहगल की ओर से इस्तीफे का कोई विस्तृत कारण बताने वाला आधिकारिक बयान नहीं आया, जिससे जानकारों और पत्रकारों में अनुमान और अलग-अलग व्याख्याएं फैल गईं। इस वजह से कई लोग सवाल उठा रहे हैं कांग्रेस जैसे विपक्षी दलों ने इस्तीफे को लेकर आलोचना की है और आरोप लगाया है कि यह पीएमओ के भीतर राजनीतिक खेल या पदों का फेरबदल है, जिसको ढकने या सरकारी मशीनरी में राजनीतिक संतुलन बदलने की कोशिश की जा रही है। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने एक प्रेसवार्ता कर कहा कि इस्तीफा भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में राजनीतिक आक्षेप का पैटर्न दिखा रहा है और आरोप लगाया कि किसी रिपोर्ट में उनका नाम आया था। यह आरोप राजनीतिक स्तर पर लगाए गए हैं क्योंकि यह पता चला है कि उनके ख़िलाफ़ रिपोर्ट के आधार पर किसी कार्यवाही के लिए सबूत नहीं थे और रिपोर्ट को ख़ारिज भी कर दिया गया क्योंकि वह आधारहीन थे
चूंकि प्रसार भारती देश का सार्वजनिक प्रसारणकर्ता है, जो दूरदर्शन और आकाशवाणी जैसे माध्यमों को चलाता हैए उसके अध्यक्ष के इस्तीफे को मीडिया बड़े राजनीतिक घटनाक्रम की तरह देख रही है। अचानक इस्तीफा बिना स्पष्ट कारण के और विपक्षी दलों के आरोपों ने इसे सुर्खियों में ला दिया है।
डिलीवरी फस्र्ट की नीति से बना भरोसा
यूपी कॉडर के 1988 बैच के डॉ. सहगल की पहचान किसी राजनीतिक विचारधारा से नहीं, बल्कि परिणाम आधारित प्रशासन से बनी। वे उन गिने-चुने आईएएस अफसरों में रहे हैं, जिन्होंने योजनाओं को केवल आदेशों और फाइलों तक सीमित न रखकर उन्हें जमीनी स्तर तक पहुंचाने के लिए कम्युनिकेशन, मॉनिटरिंग और फीडबैक तीनों को एक सिस्टम के रूप में विकसित किया।
मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में सूचना विभाग में रहते हुए उन्होंने सरकारी योजनाओं को गांव-गांव तक पहुंचाने के लिए स्थानीय भाषा, दृश्य माध्यम और क्षेत्रीय नेटवर्क का उपयोग बढ़ाया।
मायावती शासन में बिजली , पानी के क्षेत्र में बड़े सुधारों तथा रिकॉर्ड बिजली उत्पादन के काम, शहरों की कूड़ा व्यवस्था के प्रयास जिसमे प्रधानमंत्री अवार्ड भी मिला के साथ साथ सांस्कृतिक, राज्य स्तरीय आयोजनों को अनुशासन, पारदर्शिता और तय समय सीमा से जोड़ते हुए डिसिप्लिन्ड ब्रांडिंग की नींव रखी।
अखिलेश यादव सरकार में एक्सप्रेसवे से लेकर मेट्रो तक तथा इन्वेस्ट यूपी की संरचना को नए ढंग से प्रस्तुत किया गया। सिंगल-विंडो संवाद, नीति-प्रचार के आधुनिक मॉडल और रोड शो संस्कृति ने उत्तर प्रदेश को निवेशकों के बीच इन्वेस्टमेंट फ्रेंडली स्टेट के रूप में स्थापित किया।
योगी आदित्यनाथ सरकार के दौरान इंवेस्टर्स समिट, अंतरराष्ट्रीय रोड शो और धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों के जरिए यूपी की छवि को केवल कानून-व्यवस्था से जोडक़र नहीं, बल्कि आर्थिक अवसरों के केंद्र के रूप में प्रस्तुत किया गया। इसी दौर में बड़े पैमाने पर निवेश प्रस्ताव और रोजगार रोडमैप सामने आए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रशासनिक मॉडल में डिलीवरी, ब्रांडिंग और सिस्टम बिल्डिंग को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है। डॉ. सहगल की पूरी सेवा-यात्रा इन्हीं तीन स्तंभों पर आधारित रही, यही वजह है कि सेवानिवृत्ति के बाद भी वे केन्द्र के नीति और निवेश से जुड़े मंचों पर सक्रिय भूमिका में बने रहे।
डा. सहगल मॉडल के पाँच स्तंभ
1. नीति को जन-ब्रांड में बदलना
2. समयबद्घ : डिलीवरी पर जीरो टॉलरेंस
3. राजनीति से दूरी, सिस्टम से नजदीकी
4. केंद्र-राज्य सेतु की भूमिका
5. इवेंट नहीं, इकोसिस्टम बनाना
इनसेट बॉक्स
चार सरकारें, एक भरोसा
मुलायम सिंह यादव : सूचना नेटवर्क और जनदृसंचार मॉडल
मायावती : अनुशासित राज्य-ब्रांडिंग
अखिलेश यादव : निवेश प्रोत्साहन और टेक्नोक्रेटिक मॉडल
योगी आदित्यनाथ : ग्लोबल इवेंट और निवेश मंच
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