उत्तर प्रदेश

UP Bureaucracy: योगी सरकार पर भारी पड़ रहे हैं इन्वेस्ट यूपी के कारनामें!

मजाक बना दिया है भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस नीति

UP Bureaucracy: लखनऊ। इंवेस्ट यूपी में भारी भरकम आईएएस अफसरों की फौज होने और एसी के कमरे में बैठकर ठंडी-ठंडी हवा खाने के साथ ही योगी सरकार की छवि से खिलवाड़ करने से बाज नहीं आ रहे हैं। पहले तीन फर्जी एमओयू से योगी सरकार की छवि को देश और दुनिया में छीछालेदर करवाई। अब इंवेस्ट यूपी के अंदर चल रहे आईएएस अफसरों के खुला खेल फरुखाबादी के कारनामों से सरकार की भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस नीति का मजाक उड़ा रहे हैं। तीन उदाहरणों से इंवेस्ट यूपी में तैनात आईएएस अफसरों की कार्यप्रणाली की पोल खुल रही है।

आपको बताते चलें कि मुख्यमंत्री के अधीन आने वाले औद्योगिक एवं अवस्थापना विकास विभाग के तहत इंवेस्ट यूपी में तैनात आईएएस अफसरों की नियमों को ताक पर रखने के साथ ही आंख बंद कर काम कर रहे हैं।

घपलेबाज को बनाया जीएम पॉलिसी सेल

 पहला प्रकरण : पशुपालन विभाग के पूर्व सीईओ नीरज गुप्ता को अनियमितताओं के आरोप में हटाए गए। इंवेस्ट यूपी के कुछ आला अफसरों की मेहरबानी की वजह से सीधे जीएम पॉलिसी सेल बनाए जाने पर सवाल उठे। यह प्रकरण खूब चर्चा में रहा और इससे योगी सरकार की छवि प्रभावित हुई। शासन के आला अफसर हरकत में आए और तब 27 मार्च को इंवेस्ट यूपी ने नीरज गुप्ता को नोटिस जारी किया और 3 अप्रैल को पद से हटा दिया गया। लेकिन इंवेस्ट यूपी के आईएएस अफसर मामले को दबाने में सफल रहे।

Neeraj Gupta, GM of Invest UP (File Photo)

 

 

 

 

 

 

 

 

वित्त अधिकारी पर मेहरबान हैं आईआईडीसी

दूसरा प्रकरण : इंवेस्ट यूपी के आईएएस अफसरों की मेहरबानी का दूसरा प्रकरण देखने से साफ पता चलता है कि  किस तरह से योगी सरकार की आंख में धूल झोंक रहे हैं। वित्त विभाग के अपर मुख्य सचिव दीपक कुमार ने 30 नवम्बर 204 को वित्त अधिकारी विश्वजीत राय छह माह का सेवा विस्तार दिया था।

Vishwajeet Rai Finanace Controller Of Invest UP (File Photo)

उस समय विश्वजीत राय पीजीआई, यू-पी-डी और इन्वेस्ट यूपी का कार्य देख रहे हैं। इसके बाद वित्त विभाग ने कोई सेवा विस्तार नहीं दिया।  रिटायरमेंट के बाद भी धड़ल्ले से वित्त अधिकारी का कार्य देख रहे हैं।

सरकारी दमाद है अर्नेस्ट एंड यंग कम्पनी

तीसरा प्रकरण : वर्ष 2013 से व्यवसायिक सेवा देने वाली अर्नेस्ट एंड यंग कम्पनी इंवेस्ट यूपी (उद्योग बंधु) दे रही है। एमओयू के जरिए सेवाओं के बदले पहले 3 करोड़ रुपए से शुरू हुआ खेल अब लगभग 20 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। इस फर्म के एमओयू का कार्यकाल बीते साल अक्टूबर में पूरा हो गया था। अभी तक करार नहीं बढ़ा है। आश्वासन पर काम हो रहा है। अर्नेस्ट एंड यंग का काम है कि यूपी में निवेश प्रस्तावों को बढ़ावा दे। इस फर्म को करोड़ों रुपए की भारी भरकम धनराशि दी जा रही है। रिजल्ट यह है कि यह फर्म अपना काम बेहतर ढंग से न कर पाने के कारण फर्जी एमओयू हो रहे हैं। जबकि इस फर्म की जिम्मेदारी है जिस भी कम्पनी से एमओयू हो रहा है। उसकी सभी पपत्रों की जांच करे। कोई फर्जीवाड़ा तो नहीं है। इन खामियों को कुछ आईएएस अफसर अपने निजी हितों के लिए छिपा रहे हैं।

 

फर्जी एमओयू बने सरकार के लिए सिरदर्द

Austin University MOU Of UP Government (File Photo)

इंवेस्ट यूपी और अर्नेस्ट एंड यंग कम्पनी की घोर लापरवाही की वजह से बीते तीन साल के अंदर योगी सरकार ने सैन फ्रांसिस्को की ऑस्टिन यूनिवर्सिटी के साथ यूपी में नॉलेज स्मार्ट सिटी बनाने के लिए समझौता किया था। ऑस्टिन यूनिवर्सिटी यूपी में 5 हजार एकड़ में नॉलेज सिटी बनाएगी। इसकी लागत करीब 35 हजार करोड़ रुपए थी।

Vue Now Mou Of UP Government (File Photo)

इसी तरह नवंबर 2022 में व्यूनाउ इंफोटेक प्राइवेट लिमिटेड और यूपी सरकार के बीच एमओयू करार हुआ था। इसके तहत प्रदेश में 750 एज डेटा सेंटरों के बुनियादी ढांचे को विकसित किया जाना था। यूपी सरकार और व्यूनाउ कंपनी के बीच 13,500 करोड़ यानी लगभग 1.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर के समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं। इंवेस्ट यूपी और पुच एआई ने यूपी सरकार से 25 हजार करोड़ का एमओयू साइन किया गया था। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस एमओयू की घोषणा सोशल मीडिया पर करवा दी थी।

FILE PHOTO

इसके बाद सोशल मीडिया से पुच एआई के फर्जीवाड़े का मामला प्रकाश में आया था। इस मामले में योगी सरकार की छवि खूब धूमिल हुई। फर्जीवाड़े का मामला प्रकाश में आने के बाद मुख्यमंत्री की फटकार के बाद इस एमओयू को निरस्त किया गया था।

जिम्मेदार आईएएस लगे हैं मामले को छिपाने में!

इंवेस्ट यूपी के सूत्रों का कहना है कि इंवेस्ट यूपी आईएएस अफसरों के लिए आरामगाह बन गया है। अर्नेस्ट एंड यंग के लगभग 30 कर्मी आईएएस अफसरों की सेवा में लगे रहते हैं। इस वजह से वे अपने मूल काम पर फोकस नहीं कर पा रहे हैं। इंवेस्ट यूपी में वर्तमान सीईओ महोदय आंकड़ों की बाजीगरी के माहिर खिलाड़ी हैं। पंचायत विभाग में इनकी बाजगरी का उदाहरण भरे हुए हैं। इंवेस्ट यूपी के हाल के तीन प्रकरण सीईओ की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करते हैं। घपले का आरोपी पशुपालन विभाग के अधिकारी कैसे इंवेस्ट यूपी में जीएम बन गया। एक रिटायर्ड वित्त अधिकारी कैसे अभी तक कार्य कर रहा है? अर्नेस्ट एंड यंग का एमओयू नहीं बढ़ा है। इसके बावजूद किस आधार पर अपनी सेवाएं जारी कर रखा है। इस तरह के नियमों को ताक पर रखकर तमाम मामले हैं। इंवेस्ट यूपी में रिटायर्ड  अधिकारी और प्राइवेट कार्मिकों को खूब भरा जा रहा है। जिसकी कोई भी जवाबदेही नहीं है। मुख्यमंत्री से जुड़े इस इंवेस्ट यूपी में प्राइवेट कार्मिकों की न कोई जांच पड़ताल होती है और न ही कोई एलआईयू होती है। जिससे पता चल सके कि उसकी कार्य प्रणाली कैसी है और कोई आपराधिक रिकॉर्ड तो नहीं है। इंवेस्ट यूपी के सीईओ विजय किरन आनंद और अपर मुख्य सचिव औद्योगिक आलोक कुमार और आईआईडीसी दीपक कुमार से कई बार टेलीफोनिक सम्पर्क किया गया। लेकिन कोई भी जवाब नहीं दिया।

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NDS Desk

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