UP Bureaucracy: सरकारी नहीं, निजी दूतों का मायाजाल!
UP Bureaucracy: लखनऊ, अपने आईएएस कैरियर में ‘धाकड़ फैसलों’ के लिए मशहूर यूपी के ‘तेज’-‘तर्रार’ मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह देश के सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आदेशों को नजर अंदाज करते हैं। बीते साल मुख्यमंत्री ने निर्देशित किया था कि संवेदनशील विभागों के मुखिया किसी भी प्राइवेट व्यक्ति को साथ में ‘इंवाल्व’ नहीं रखेंगे। मुख्यमंत्री के आदेशों को दरकिनार कर मुख्य सचिव ने अपने पुराने और खास प्राइवेट सेवक को सरकारी और गैरसरकारी कामों के लिए प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष तौर पर ‘इंवाल्व’ कर रखा है। सबसे रोचक बात यह है कि मुख्य सचिव के साथ अप्रत्यक्ष तौर पर तैनात ये ‘गैरसरकारी सेवक’ डंके की चोट पर काम करने के साथ कम्पनियों को भी ऑपरेट कर रहे हैं। इससे यूपी के मुख्य सचिव की कार्य प्रणाली सवालों के घेरे में है।
बताते चलें कि 1988 बैच के वरिष्ठ आईएएस और यूपी के मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह जहां-जहां भी तैनात रहे हैं वहां-वहां बड़े विवाद और अनियमितताएं हुई हैं। उसके कारण उस समय की सरकारों की खूब फजीहत हुई थी। 2007 में मायावती की सरकार में मनोज कुमार सिंह ग्राम्य विकास विभाग के आयुक्त थे। इन्हीं के कार्यकाल में मनरेगा घोटाला प्रकाश में आया था। जिसके कारण मायावती सरकार खूब फजीहत हुई थी। ग्राम्य विकास विभाग में तैनात एक महिला ने मनोज कुमार सिंह पर बहुत ही गंभीर आरोप लगाए थे। मायावती सरकार ने इस मामले की जांच तत्कालीन मुख्य सचिव अनूप मिश्र से करवाई थी। यह मामला भी काफी चर्चा का विषय बना हुआ था। (UP Bureaucracy)
वर्ष 2012 में अखिलेश यादव सरकार में भूमि विकास एवं जल संसाधन विभाग में प्रमुख सचिव के पद पर तैनात मनोज कुमार सिंह ने विभागीय पूर्व मंत्री शिवपाल सिंह यादव को नजर अंदाज कर 3100 करोड़ वाली समेकित वाटरशेड प्रबंधन कार्यक्रम (आईडब्ल्यूएमपी) को अपनी चहेती फर्म प्रोएक्ट को दिया था। इसको खूब हंगामा मचा था। मामला खुलने पर सख्त कार्रवाई हुई थी। विभाग से हटा दिए गए थे।
2025 में योगी सरकार में मुख्य सचिव के तौर पर काम कर रहे मनोज कुमार सिंह ने नियमों को ताक पर रखकर एक चीनी मिल की लीज डीड रिन्यू करने के प्रकरण में प्रमुख सचिव चीनी और गन्ना विकास वीना कुमार मीना से ठन गई थी। यह विवाद इतना बढ़ा कि मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह ने अपने स्तर दो अनुभाग अधिकारियों को निलम्बित करने के साथ ही प्रमुख सचिव वीना कुमार मीना के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही के लिए नियुक्ति विभाग को पत्र लिखा था।
मुख्यमंत्री के हस्तेक्षप के बाद यह विवाद थमा था। मुख्य सचिव और औद्योगिक विकास आयुक्त के तौर पर नियमों को ताक पर रखकर ऐसे-ऐसे फैसलें किए हैं। जिनसे राज्य सरकार को अरबों रुपए के राजस्व को चूना लगा है। जिसकी शिकायत पीएमओ, सीबीआई, विजीलेंस और यूपी सरकार से हुई थी। मुख्य सचिव की इस कार्यप्रणाली के शिकार कई आईएएस अफसर हो चुके हैं। जिनमें रितु माहेश्वरी, लोकेश एम, मनोज सिंह, अनिल सागर, वीना कुमारी मीना और अभिषेक प्रकाश हैं। सूत्रों का कहना कि इन अफसरों ने मुख्य सचिव के मौखिक आदेशों का पालन किया और फिर कार्रवाई की जद में आ गए। प्रमुख सचिव औद्योगिक विकास विभाग आलोक कुमार से भी नहीं बन रही है। इसकी अहम वजह यह है कि नियमों को ताक पर रखकर कार्यशैली की वजह से यूपी बहुत से आईएएस अफसरों के साथ खटास भरे संबंध हैं।
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‘गैर सरकारी सेवकों’ की कम्पनियों को मिलता है मेवा
मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह के साथ अप्रत्यक्ष तौर पर तीन महानुभाव अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। इनमें पहले नम्बर पर संदीप मांझी हैं। ये महोदय एक एनजीओ प्रोएक्ट के सीईओ हैं।
यूपी में इस एनजीओ ने कई-कई विभागों में खूब कार्य किए हैं। यह शख्स साये की तरह हर समय साथ रहते हैं। सरकारी मीटिंगों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष शामिल रहता है। अप्रत्यक्ष तौर पर गैरसरकारी सेवाएं दे रहे दूसरे मान्यवर हैं वेंकेट रमन सुदर्शन।
ये महोदय मुख्य सचिव से दिग्गज कारोबारियों को मिलवाने में अहम रोल अदा करते हैं। इनकी एक कम्पनी है आईडेंस बीडीएस। जिस पर मुख्य सचिव महोदय का खास आर्शीवाद है। जिसमें निदेशक के तौर पर शामिल हैं। मुख्य सचिव के साथ अप्रत्यक्ष तौर पर काम करते हैं तो हर सरकारी विभागों में इस इवेंट मैनेजमेंट कम्पनी को खूब काम मिलता है।
जनसूचना अधिनियम से प्राप्त सूचना के मुताबिक उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग के आम महोत्सव का काम किया है। इसी तरह इंवेस्ट यूपी में भी खूब काम किया है। यह माध्यम बना है औद्योगिक संस्थान सीआईआई। नाम सीआईआई का काम आईडेंस बीडीएस है। कई सरकारी विभागों के सूत्रों का कहना है कि आईडेंस बीडीएस को काम देने का काफी दबाव रहता है। एक और प्राइवेट व्यक्ति विकास रस्तोगी सेवाएं दे रहा है। इस बंदे का काम लाइजनिंग का है। सीएस का पुराना सेवक है।
चल-अचल संपत्ति से मोह भंग!
वर्ष 2011 में डीओपीटी को दिए गए सम्पत्तियों के विवरण में बताया है कि गौतमबुद्घ नगर ग्रेटर नोएडा के ग्रीनवुड में एक विला 32 लाख रुपए में खरीदा। वर्ष 2011 में सुशांत गोल्फ सिटी में 13.85 लाख रुपए में एक प्लॉट खरीदा। बाकी वित्त वर्ष में सम्पत्ति का डिटेल देखने के बाद सामने आया कि इन आईएएस महोदय को घोषित तौर पर चल-अचल सम्पत्ति खरीदने का मोहभंग हो गया।
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