UP Politics The BJP Will Swallow Up the Dalit Vote Bank
राजेन्द्र के. गौतम
लखनऊ। बसपा की 2027 के विधान सभा चुनाव की तैयारियां कछुवा चाल से होने के कारण उसका बचा हुआ 9.3 प्रतिशत दलित वोट बैंक भाजपा डकार जाएगी। इसके लिए भाजपा ने दलित वोट बैंक पर डोरे डालने के लिए भारत रत्न बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर की 14 अप्रैल को जंयती धूमधाम से मनाने के साथ ही डॉ. बी.आर. आंबेडकर मूर्ति विकास योजना पर 403 करोड़ रुपए खर्च करने रणनीति बनाई है। बसपा का दलित वोट बैंक हथियाने के लिए जहां सपा पीडीए का दावं चल रही है वहीं कांग्रेस भी संविधान को खत्म करने के मुद्दे को जोर-शोर से उठा रही है।
यूपी के 2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा को 12.88 प्रतिशत वोट मिले और मात्र एक सीट ही जीत पाई थी। 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा को 9.38 वोट प्रतिशत मिला और एक भी सीट नहीं जीत पाई। इन परिणामों ने जहां सपा के हौंसले बुलंद कर दिए, वहीं बसपा और भाजपा को भी तगड़ा झटका लगा। 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए सपा और भाजपा ने तगड़ी तैयारियां शुरू कर दी हैं। इन दोनों पार्टियों ने बसपा के बचे हुए वोट बैंक पर निशाना साध लिया है। जबकि बसपा 2027 के चुनाव की तैयारियां कर रही है। लेकिन तैयारियों को लेकर जनता में मुखर संदेश नहीं दे पा रही है। जिसकी वजह से दलित वोट बैंक दुविधा में फँसा हुआ है।
इसी के मद्देनजर योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा हाल ही में मंजूर की गई डॉ. बी.आर. आंबेडकर मूर्ति विकास योजना ने इस मुकाबले को नई दिशा दी है। 403 करोड़ की इस योजना के तहत प्रदेश की हर 403 विधानसभा सीट पर 10-10 महापुरुषों आंबेडकर, संत रविदास, कबीर दास, ज्योतिबा फुले, महर्षि वाल्मीकि आदि की मूर्तियों पर छत्र लगाने, बाउंड्री वॉल बनाने, सौंदर्यीकरण और लाइटिंग का काम होगा। प्रति सीट 1 करोड़ और प्रति मूर्ति 10 लाख का प्रावधान किया गया है। भाजपा की रणनीति प्रतीकात्मक सम्मान और दृश्यमान विकास पर आधारित है। 2024 लोकसभा चुनाव में दलित वोटों में नुकसान के बाद भाजपा ने सामाजिक समरसता का संदेश देते हुए गैर-जाटव दलित उप समूहों (पासी, वाल्मीकि आदि) को लक्षित किया है। योजना को अंबेडकर जयंती 14 अप्रैल से जोडक़र स्थानीय स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिससे भाजपा विधायक और नेता क्रेडिट ले सकें। भाजपा इसे सपा सरकार के दौरान मूर्तियों की कथित उपेक्षा से जोड़कर अपना कंट्रास्ट पेश कर रही है। उद्देश्य है हिंदुत्व के साथ सामाजिक न्याय के प्रतीकों को जोडऩा और 2027 में सपा-बसपा गठबंधन से दलित समर्थन छीनना। सामाजिक कल्याण मंत्री असीम अरुण सक्रिय रूप से योजना का प्रचार कर रहे हैं।
दूसरी ओर सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने योजना को सम्मान का ढोंग करार दिया है। उन्होंने कहा कि योगी सरकार आरक्षण छीन रही है, नौकरियों में दलितों, पिछड़ों का हक मार रही है, लेकिन मूर्तियों पर छत्र लगाकर दिखावा कर रही है। पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक यानी पीडीए फॉर्मूले पर टिकी है। सपा पार्टी ने अंबेडकर जयंती को गांव, बूथ स्तर पर मनाने का ऐलान किया है। अंबेडकर वाहिनी को सक्रिय कर दलित आउटरीच बढ़ाया जा रहा है। सपा का फोकस गैर-जाटव दलितों को आकर्षित करना और सपा मुख्यालय पर आंबेडकर प्रतिमा लगाकर प्रतीकात्मक कदम उठाना है। 2024 में पीडीए के जरिए दलित वोटों में मिली सफलता को 2027 तक बनाए रखना सपा का लक्ष्य है।
बसपा सुप्रीमो मायावती इस योजना को चुनावी स्टंट और दलित वोट छीनने की साजिश बता रही हैं। उनका तर्क है कि असली सम्मान सत्ता में हिस्सेदारी और स्वतंत्र बहुजन राजनीति से आता है, न कि मूर्तियों के सौंदर्यीकरण से। बसपा अपनी पुरानी सरकारों में बनी मूर्तियों और स्मारकों को हाइलाइट कर रही है। मायावती कांशीराम जयंती को बड़े स्तर पर मनाकर कैडर को एकजुट करने और युवाओं को आकर्षित करने की कोशिश कर रही हैं। बसपा का मुख्य फोकस जाटव वोट को बनाए रखना और सपा को दलित विरोधी बताना है, ताकि दलित वोट सीधे बसपा में लौटे।
2024 लोकसभा के चुनाव में 9.4 प्रतिशत वोट के कारण पार्टी अल्पसंख्यक और पिछड़ों की ओर भी शिफ्ट कर रही है। तीनों दलों की रणनीतियों में समानता और अंतर दोनों हैं। भाजपा प्रतीक ़विकास का मॉडल अपनाकर भावनात्मक अपील कर रही है, जबकि सपा और बसपा आरक्षण, संविधान और असली सामाजिक न्याय के मुद्दे उठा रही हैं। सपा गठबंधन के जरिए दलितों को अपनी ओर खींच रही है, बसपा अलग पहचान बनाए रखकर वोट फूटने से रोकना चाहती है। विश्लेषकों का मानना है कि यह त्रिकोणीय लड़ाई भाजपा को फायदा पहुंचा सकती है, क्योंकि सपा-बसपा के बीच आपसी वोट छीनने का आरोप जारी है।
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