दिव्य सन्देश विशेष

दलितों की ‘महावत’ बनती भाजपा

  • 2014 से चल रहा है मोदी-योगी का जादू
  • भारी संख्या में दलित नेता और रिटायर्ड अफसर ज्वाइन कर रहे हैं भाजपा
  • बसपा-सपा और कांग्रेस के मायाजाल से निकल रहा है एससी-एसटी वर्ग

राजेन्द्र के. गौतम

लखनऊ। कभी देश में राष्ट्रीय पार्टियों के लिए चुनौती बनी बहुजन समाज पार्टी (बसपा) 2007 के बाद से जहां तेजी से जनाधार सिकुड़ रहा है वहीं विभिन्न क्षेत्रों के दलित हस्तियों का मोहभंग हो रहा है। बीते 15 वर्षों से अपने परम्परागत दलित वोट बैंक से संवादहीनता के कारण बसपा का न तो दलित-ब्राह्मïण और न ही दलित-मुस्लिम गठजोड़ की सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला सफल हो पा रही है। राजनीतिक तौर पर कमजोर हो चुकी बसपा की गलत नीतियों के कारण एक ओर कांग्रेस दलितों को लुभाने के लिए अध्यक्ष जैसे पदों पर ताजपोशी कर रही है तो दूसरी ओर दलित हस्तियों का भाजपा तेजी से ठिकाना बन रही है।

उल्लेखनीय है कि यूपी विधान सभा का चुनाव हो या फिर लोकसभा का आम चुनाव हर एक में भाजपा तेजी से रिकार्ड बना रही है। इसका सबसे अहम कारण यह है कि बसपा सुप्रीमो मायावती की पुरानी परम्परागत राजनीति की कार्यशैली के कारण दलितों का तेजी से बसपा से मोहभंग हुआ है। भाजपा ने दलित वोट बैंक पर काबिज होने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और यूपी के लोकप्रिय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लगाया। इन दोनों दिग्गज नेताओं की कार्यशैली और नीतियों व दलितों के लिए कल्याणकारी योजनाओं का लाभ दलित समाज के पास सरकारी योजनाओं के तहत पहुंचने लगा। गरीब महिलाओं के लिए मुफ्त गैस कनेक्शन, शौचालयों का निर्माण और आवास जैसी योजनाओं ने दलितों को तेजी से अपनी ओर आकर्षित किया। इसी बात को भांप कर राजनीतिक महत्वकांक्षा पाले दिग्गज दलित हस्तियां तेजी से भाजपा के साथ जुडऩे लगे। 2022 के चुनाव में तेजतर्रार आईपीएस असीम अरूण ने नौकरी से इस्तीफा देकर भाजपा से चुनाव लड़े और मंत्री बनाए गए। पूर्व डीजीपी बृजलाल ने भी भाजपा ज्वाइन की और राज्य सभा भेजे गए। सचिवालय संघ के अध्यक्ष डा. लालजी निर्मल ने भी भाजपा ज्वाइन की और उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति वित्त विकास निगम के अध्यक्ष बनाए गए। इसी तरह काफी संख्या में दलित वर्ग के आईएएस और आईपीएस  भाजपा ज्वाइन करने की फिराक में है। कभी बसपा के समर्थक रहे आईपीसी प्रेम प्रकाश जल्द भाजपा ज्वाइन कर अपनी राजनीतिक पारी शुरू कर सकते हैं। इसी तरह भारी संख्या में भाजपा में बसपा, सपा, कांग्रेस के दलित नेता ज्वाइन करने की तैयारी में है।

 

भाजपा निगल रही है बसपा का जनाधार

यूपी में दलितों की आबादी लगभग 21.5 प्रतिशत है। वहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कई सीटों पर दलित वोट बैंक निर्णायक भूमिका में है। प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से 85 सीटें अनुसूचित जाति (एससी) के लिए सुरक्षित हैं। इसके साथ ही कुल 150 सीटों पर दलित वोट बैंक का प्रभाव है। इन सीटों पर दलित निर्णायक हैं और दलितों को बसपा का वोट बैंक माना जाता रहा है लेकिन पिछले कुछ सालों में ये वोट बैंक बसपा से छिटकता जा जा रहा है। प्रदेश की 85 सुरक्षित सीटों पर 2012 में सपा ने 31.5 फीसदी वोट लेकर 58 और बसपा ने 27.5 प्रतिशत वोटों के साथ 15 सीटें जीती थीं। वहीं भाजपा को 14.4 फीसदी वोट के साथ महज 3 सीटें मिली थीं। 2017 में नतीजे बिल्कुल उलट गए और 85 सुरक्षित सीटों पर 2017 के नतीजों में 69 सीटें भाजपा ने जीती। उन्हें 39.8 प्रतिशत वोट मिले। वहीं सपा को 19.3 फीसदी वोट और 7 सीट मिली जबकि बीएसपी सिर्फ  2 सीटें जीत पाई।

2014 के लोकसभा चुनावों में बसपा के हाथ कुछ नहीं लगा था। बसपा एक भी सीट नहीं जीत पाई थी। वहीं अकेले लडक़र भी समाजवादी पार्टी को 5 सीटें आई थीं। 2019 में हुए सपा-बसपा के गठबंधन के चलते बसपा 10 सीटें जीतने में कामयाब हुई, जबकि समाजवादी पार्टी 5 सीटों पर ज्यों की त्यों बनी रही। 2019 के लोकसभा चुनावों में दलितों की तुलना में यादव और मुसलमानों ने गठबंधन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई। लोकसभा चुनाव से पहले बने सपा-बसपा के गठबंधन में दरअसल फायदा तो मायावती को ही पहुंचा, समाजवादी पार्टी को नहीं, क्योंकि यादवों ने एकजुट होकर बसपा को वोट डाला लेकिन दलितों ने समाजवादी पार्टी के लिए ऐसी एकजुटता नहीं दिखाई। यादव, दलित और मुसलमान मिलकर उत्तर प्रदेश का 49 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं। उत्तर प्रदेश में दलित वोट दो श्रेणियों में बंटे हुए हैं जाटव और गैर जाटव जहां जाटव दलित बीएसपी को समर्थन देते रहे हैं, वहीं गैर जाटव दलितों ने 2014 के चुनावों से ही पार्टी से दूरी बना ली थी। यादव, दलित, मुसलमान समुदायों में से 10 प्रतिशत तो गैर जाटव ही हैं,  अब सपा-बसपा गठबंधन के पास 39 प्रतिशत वोट बैंक बच पाता है। सर्वे ने यह भी साफ  किया जहां 72 प्रतिशत यादवों ने गठबंधन को वोट दिया, वहीं 74 प्रतिशत जाटव दलितों ने गठबंधन को चुना। 2019 के हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा को दलित वर्ग ने भरपूर वोट दिया। 20 प्रतिशत यादव, 21 प्रतिशत जाटव दलितों ने भाजपा को चुनाव गैर जाटवों में से 60 प्रतिशत ने भाजपा को वोट दिया और 30 प्रतिशत ने गठबंधन को। गैर जाटव दलितों को अपनी तरफ  लाने के लिए भाजपा की कल्याणकारी स्कीमों का बड़ा योगदान था। गरीब महिलाओं के लिए मुफ्त गैस कनेक्शन, शौचालयों का निर्माण और आवास जैसी स्कीमों ने गैर जाटव वोट बैंक को अपनी ओर खींचा।

 

सुरक्षित सीटें बनी सफलता की सीढिय़ां

2007 के विधान सभा चुनाव में अनुसूचित जाति के लिए 89 सीटें आरक्षित थीं, तब बसपा ने 61 आरक्षित सीटों पर जीत दर्ज की थी। सपा ने 13, भाजपा ने सात, कांग्रेस ने पांच, आरएलडी, राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी व निर्दलीय ने एक-एक सीट पर जीत दर्ज की थी। बसपा ने 69 प्रतिशत सुरक्षित सीटों पर जीत दर्ज कर प्रदेश की सत्ता पर कब्जा किया था और पूरे पांच साल सरकार चलाई।  साल 2012 के भी विधानसभा चुनाव में 85 सीटें अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित थी। सपा ने इनमें से 58, बसपा ने 15, कांग्रेस ने चार, बीजेपी ने तीन, आरएलडी ने तीन और निर्दलीयों ने दो सीटों पर जीत दर्ज की थी। सपा ने इस चुनाव में आरक्षित वर्ग की 68 प्रतिशत सीटों पर जीत दर्ज कर प्रदेश में अपने दम पर बहुमत लाकर पहली बार सरकार बनाई थी। 2017 के विधानसभा चुनाव में आरक्षित सीटों की संख्या 86 हो गई थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर प्रदेश में पहली बार दो सीटें एसटी के लिए आरक्षित की गई थीं। ये दोनों सीटें सोनभद्र जिले में हैं। भाजपा ने इनमें से 70 सीटों पर जीत दर्ज की थी। उसने एससी वर्ग की 69 और एसटी वर्ग की एक सीट जीती थी। सपा ने सात, बसपा ने दो और एक सीट निर्दलीय ने जीती थी। अपना दल एस ने तीन सीटें जीती थी। इनमें से दो एससी और एक एसटी वर्ग के लिए आरक्षित सीट थी। सुभासपा ने तीन सीटों पर जीत दर्ज की थी। इस चुनाव में भाजपा गठबंधन ने 88 प्रतिशत सीटों पर जीत दर्ज कर प्रदेश में सरकार बनाई थी। 2022 के विधान सभा के चुनाव में एक बार फिर साबित हो गया है कि सुरक्षित सीटें सत्ता तक पहुंचने की सीढ़ी हैं, जो दल इनमें से अधिकांश सीटें जीतता रहा है, उसे ही सत्ता मिली है। भाजपा गठबंधन ने लगातार दूसरी बार सीटें जीतने में न केवल ओवरआल शानदार प्रदर्शन किया है, बल्कि 65 सुरक्षित सीटों पर भी सफलता पाई है।

 


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NDS Desk

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