लखनऊ। 2009 से शुरू हुआ बसपा की दुर्गति का खेल 2026 तक जारी है। हाल ही में पांच राज्यों के चुनाव में बसपा मात्र तीन राज्यों केरल, तमिलनाडू और बंगाल में अपने प्रत्याशी उतारे थे। बसपा की बड़ी दुर्गति हुई। जहां बसपा प्रत्याशियों की जमानत जब्त हुई वहीं राष्ट्रीय दर्जा प्राप्त बसपा का प्रदर्शन क्षेत्रीय पार्टियों से भी कम हो गया है। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि 2027 के विधानसभा चुनाव में बसपा का प्रदर्शन कैसे रहेगा। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर बसपा की मॉडस ऑपरैंडी यही रही तो आत्मघाती साबित होगी।
विधान सभा चुनाव से फर्श पर पहुंचने का शुरू हुआ सफर
आपको बताते चलें कि बसपा बीते 20 साल में अर्श से फर्श पर पहुंच गई है। 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने 206 सीटें जीतकर अपने बल पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। इस चुनाव में बसपा को 30.43 प्रतिशत मत मिला था। 2012 के चुनाव में 80 सीटें जीती थीं और मत प्रतिशत 25.91 प्रतिशत मिला था। 2017 में 19 सीटें जीती और 22.23 मत प्रतिशत मिला था। 2022 के चुनाव में 1 सीट जीती और मत प्रतिशत 12.88 मिला।
लोकसभा में बसपा को लगा तगड़ा झटका
2009 के लोकसभा के चुनाव में 20 सीटें जीती थी और मत प्रतिशत 27.42 मिला। 2014 में एक भी सीट नहीं जीती और मत प्रतिशत 19.64 मिला। 2019 में सपा के साथ गठबंधन में बसपा 10 सीटें जीती और 19.43 प्रतिशत रही। 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा एक भी सीट नहीं जीत पाई और मत प्रतिशत घटकर 9.39 रह गया।
5 राज्यों के चुनाव में जमानत हुई जब्त
हाल ही में हुए पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव में बसपा असम और पांडुचेरी में नहीं लड़ी। केरल, तमिलनाडु और बंगाल में बसपा ने अपने प्रत्याशी उतारे थे। इन तीन राज्यों में बसपा का एक भी प्रत्याशी नहीं जीत पाया और केरल में बसपा को 0.15 प्रतिशत, तमिलनाडु में 0.11 प्रतिशत और बंगाल में 0.18 प्रतिशत मत मिले।
जनता से कटने का नतीजा
बसपा की राजनीति पर बारीक नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक योगेश श्रीवास्तव का कहना है कि यह बड़े अश्चर्य की बात है कि यूपी में चार बार सरकार बनाने वाली बसपा अर्श से फर्श पर पहुंच गई है। जिसमें तीन बार गठबंधन से और एक बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का रिकॉर्ड है। बसपा का कॉडर और नेता अनुशासन के लिए विख्यात हैं। बसपा के पतन में कई फैक्टर हैं। सबसे बड़ा फैक्टर यह है कि जनता के दिलों में राज करने वाली आयरन लेडी बसपा सुप्रीमो मायावती वर्ष 2007 के बाद से जनता से कट गई। साथ ही बसपा से विभिन्न जातियों के जनाधार वाले नेताओं को बसपा सुप्रीमो मायावती ने पार्टी विरोधी गतिविधियों में निकाल दिया। चुनाव के वक्त घोषित प्रत्यशियों को अचानक बदल देने से समाज में यह संदेश गया कि पैसा लेकर बसपा कभी भी प्रत्याशी बदल सकती है। जनता और बसपा के पदाधिकारियों से सीधे संवाद का कोई माध्यम नहीं है। बसपा ने दूसरी और तीसरी लेयर के नेता नहीं बनाए। युवाओं को ज्यादा मौका नहीं दिया। बसपा में जिस भी नेता का कद बढ़ा, उसे तत्काल साइडलाइन कर दिया गया। बसपा जिस भी नेता की राजनीति को खत्म करना चाहती है, तो उसे दूसरे प्रदेश में प्रभारी बनाकर भेज देती है। जहां न तो उसे भाषा का ज्ञान होता है और न ही लोक व्यवहार स्थापित करने में मदद मिल पाती है। मीडिया से पूरी तरह से दूरी बनाए रखती है।
छवि ने तोड़ी बसपा की कमर
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक सी. लाल का कहना है कि इसमें कोई शक नहीं है बसपा के कार्यकाल में कानून का राज था। जिसको जनता आज भी याद करती है। बसपा का पतन खुद बसपा ने किया है। 2007 के बाद से आज तक जितने भी राज्यों के विधान सभा और लोकसभा के चुनाव बसपा हारी, लेकिन उसकी समीक्षा बेहतर ढंग से नहीं की गई। मात्र औपचारिकता निभाने के लिए कोऑर्डिनेटरों को एक राज्य से दूसरे राज्य में ट्रांसफर कर दिया गया। बसपा की छवि के साथ खूब खिलवाड़ किया गया। बीते 20 साल में बसपा ने जमीन पर कभी भी सरकार के खिलाफ संघर्ष नहीं किया। जनता में संदेश है कि बहनजी डर गई हैं। बसपा भाजपा की बी टीम है। आदि-आदि अफवाहें फैलाई गई हैं। इन्हीं सब कारणों के चलते बसपा का तेजी से जनाधार गिरा है। अगर बसपा ने अपने दामन पर लगे दाग नहीं छुड़ाये तो 2027 के विधान सभा के चुनाव में परिणाम 2022 की तरह वाले होंगे।
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इ-पेपर: Divya Sandesh
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