राजेन्द्र के. गौतम
लखनऊ। ‘काम के न काज के ढाई सेर अनाज के’ आपने यह कहावत जरूर सुनी होगी। यह कहावत यूपी के कुछ नौकरशाहों पर सटीक साबित होती है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ यूपी को ‘वन ट्रिलियन’ इकोनॉमी बनाने के लिए दिन-रात पसीना बहा रहे हैं। योगी सरकार के सबसे विश्वासपात्र और अहम विभागों में बैठे आईएएस अफसर मुख्यमंत्री के भगीरथी प्रयासों पर पानी फेर रहे हैं। यह हम नहीं कह रहे हैं, बल्कि बीती 10 मार्च को मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक में रखे गए विभिन्न विभागों द्वारा उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए बजट आवंटन में हीरो और जीरो खर्च के आंकड़ों ने पोल खोल कर रख दी है। (UP Bureaucracy)
आपको बताते चलें कि यूपी के पूर्व मुख्य सचिव और स्टेट ट्रांसफार्मेशन कमीशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी की पहल पर 10 मार्च 2026 को यह बैठक हुई थी। इससे पूर्व इसी तरह की एक बैठक 19 जनवरी 2025 को आहूत की गई थी। इस बैठक को असफल कर दिया गया था। 25 जनवरी को सीएम समीक्षा बैठक में लिए गए निर्णयों के अनुपालन के लिए 12 बिन्दुओं पर चर्चा हुई थी। मुख्यमंत्री के समक्ष रखे गए प्रेजेंटेशन के आंकड़ों मुताबिक 12वां बिन्दु सबसे महत्वपूर्ण है। इस बिन्दु में उल्लेख है कि वित्त वर्ष 2024-25 और 2025-26 में विभिन्न विभागों ने प्रदेश में उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए बजट आवंटन खूब किया और खर्च में फिसड्डïी रहे। वित्त वर्ष 2024-25 में 5628.64 करोड़ का बजट आवंटन हुआ था। 4331.46 खर्च हुआ, यानी 77 फीसदी कम। इसी तरह चालू वित्त वर्ष 2025-26 में 7325.19 करोड़ का बजट प्रावधान किया गया है। बीती 10 मार्च तक 3812.25 करोड़ रुपए खर्च हुआ, यानी 52 प्रतिशत कम खर्च हुआ। (UP Bureaucracy)
विभिन्न विभागों की महत्वपूर्ण नीतियों के लिए चालू वित्त वर्ष के बजट आवंटन और खर्च में नजर डाले तो पिकप के तहत औद्योगिक नीति मेगा परियोजनाओं और सीआईएसएस 2012 के लिए अवसंरचना और औद्योगिक निवेश नीति 2012 में 652 करोड़ रुपए का बजट आवंटन हुआ। 243.44 करोड़ रुपए खर्च हुए, 37 फीसदी खर्च हुआ। औद्योगिक निवेश प्रोत्साहन नीति 2017 के लिए 923 करोड़ रुपए का बजट आवंटन किया गया है। इसके सापेक्ष 392.43 करोड़ खर्च हुए। यानी मात्र 32 फीसदी। त्वरित निवेश प्रोत्साहन नीति 2020 में 200 करोड़ रुपए का बजट आवंटित किया गया था। इसके सापेक्ष 71.62 करोड़ व्यय हुए हैं। यानी 43 प्रतिशत। पिकप और यूपीएफसी के लिए ब्याज मुक्त ऋण के लिए औद्योगिक निवेश प्रोत्साहन योजना 2003 के लिए चालू वित्त वर्ष में 130 करोड़ के बजट का प्रावधान किया गया था।
जिसमें मात्र 18.17 करोड़ खर्च हुए हैं। यानी मात्र 14 प्रतिशत ही खर्च हुए हैं। पिकप और यूपीएफसी के लिए ब्याज मुक्त ऋण के लिए औद्योगिक निवेश प्रोत्साहन योजना 2012 के लिए 125 करोड़ का बजट आवंटन किया गया था। जिसके सापेक्ष 50.2 करोड़ रुपए खर्च किए गए। यानी मात्र 40 प्रतिशत ही खर्च हो पाए हैं। इंवेस्ट यूपी के तहत एफडीआई और एफसीआई फार्चुन पॉलिसी 2023 का हाल सबसे बुरा है। वित्त वर्ष 2024-25 में 250 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था। 106.51 करोड़ रुपए खर्च हो पाए थे, यानी मात्र 43 प्रतिशत। वित्त वर्ष 2025-26 में 621.7 करोड़ का बजट आवंटित किया गया था। अभी तक इस पर चवन्नी भी खर्च नहीं हुए हैं। इंवेस्ट यूपी की आईआईईपीपी 2022 की योजना वित्त वर्ष 2024-25 में 30 करोड़ और चालू वित्त वर्ष 2025-26 में 100 करोड़ का प्रावधान किया गया था। इस पर भी एक रुपया तक खर्च नहीं हुआ है। यही हाल ऑक्सीजन पॉलिसी 2022 में वित्त वर्ष 2024-25 में 67.27 करोड़ का बजट का प्रावधान किया गया था। जिसमें से मात्र 23.37 करोड़ व्यय हो पाए थे, यानी मात्र 35 प्रतिशत। चालू वित्त वर्ष 2025-26 में 23.03 करोड़ रुपए का बजट दिया गया था। इस पर अभी तक एक रुपया खर्च नहीं कर पाया है। (UP Bureaucracy)
आईटी एंड इलेक्ट्रिानिक्स विभाग की सेमी कंडक्टर पॉलिसी 2024 में वित्त वर्ष 2024-25 में 39.36 करोड़ और चालू वित्त वर्ष 2025-26 में 200 करोड़ रुपए का बजट का प्रावधान किया गया। लेकिन विभाग इस बजट का एक रुपया भी खर्च करने में फेल साबित हुआ है। यही हाल डाटा सेंटर पॉलिसी 2021 का रहा पिछले वित्त वर्ष में 40 करोड़ और चालू वित्त वर्ष में भी 40 करोड़ का बजट का प्रावधान किया गया था। इस बजट को भी दोनों वर्ष खर्च कर पाने में फेल साबित हुए हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स एमएफटीजी पॉलिसी (सब्सिडी) के लिए 400 करोड़ का बजट का प्रावधान किया गया है। इसके सापेक्ष इस पर मात्र 128.6 करोड़ रुपए यानी 32 प्रतिशत खर्च हुए हैं। सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के अधीन आने वाली फिल्म पॉलिसी 2022 के तहत पिछले वित्त वर्ष में 26 करोड़ का बजट आवंटन किया गया था। जिसमें 17.66 करोड़ खर्च हुए, यानी 68 प्रतिशत।
जबकि चालू वित्त वर्ष में 15 करोड़ रुपए का बजट खर्च किया गया था। अभी तक इस बजट का एक रुपया भी खर्च नहीं हो पाया है। फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री पॉलिसी 2022 का हाल भी काफी बुरा है। 50.04 करोड़ रुपए का बजट आवंटन किया गया है। अभी तक मात्र 10.51 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं, यानी मात्र 21 प्रतिशत। फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री पॉलिसी 2023 में 300 करोड़ रुपए के बजट की व्यवस्था की गई थी। जिसमें मात्र 136.22 करोड़ रुपए ही खर्च हो पाए हैं। मिल्क पॉलिसी में चालू वित्त वर्ष में 30 करोड़ के बजट आवंटित किए गए थे। इसमें से 5.09 करोड़ खर्च हुए हैं, यानी मात्र 17 फीसदी। पॉलिट्री पॉलिसी 2022 में चालू वित्त वर्ष में 35.10 करोड़ का बजट आवंटि किया गया है। जिसके सापेक्ष 7.65 करोड़ रुपए खर्च हो जाए हैं, यानी मात्र 22 प्रतिशत ही खर्च हो पाया है।
शासन के सूत्रों का कहना है कि बीती 10 मार्च को हुई सीएम समीक्षा बैठक में सरकार की महत्वकांक्षी योजना पर वरिष्ठï आईएएस अफसरों की बजट खर्च में भारी लापरवाही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिम्मेदार अफसरों की खूल क्लास ली थी। साथ ही चेतावनी दी थी कि गैरजिम्मेदार अफसरों ने अपनी कार्यप्रणाली में बदलाव नहीं लाए तो उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
औद्योगिक विकास विभाग के सूत्रों के मुताबिक तीन आईएएस अफसरों की तैनाती के बाद से विभिन्न उद्योग नीतियों के बजट खर्च में पूरी तरह से नाकाम साबित हुए हैं। इंवेस्ट यूपी के सीईओ पद पर विजय किरन आनंद नियुक्त हैं। ये आईएएस महोदय आंकड़ों के बाजीगर हैं। पंचायत विभाग में निदेशक पद पर तैनाती के दौरान स्वच्छ भारत मिशन के तहत खुले में शौच (ओडीएफ) मुक्त करने के आंकड़ों में खूब खेल किया था। पूर्व कृषि उत्पादन आयुक्त ने एक शिकायत पर जांच की थी। जिसमें काफी गांव कागजों पर ओडीएफ घोषित हुए थे। इंवेस्ट यूपी में काफी यही खेल कर रहे हैं। इंवेस्ट यूपी के अधीन आने वाली मुख्यमंत्री की महत्वकांक्षी योजना के खर्च का बुरा हाल है। खबर के संबंध में प्रतिक्रिया के लिए संपर्क किया। लेकिन कोई जवाब नहीं दिया। (UP Bureaucracy)
औद्योगिक विकास विभाग के अपर मुख्य सचिव आलोक कुमार अक्सर सोशल मीडिया प्लेटफार्म फेसबुक पर अक्सर अपने हाल ए दिल का बयां करते हैं। औद्योगिक एवं अवस्थापना आयुक्त दीपक कुमार और इंवेस्ट यूपी के सीईओ विजय किरन आनंद पटरी नहीं खाती हैं। आपसी तालमेल की कमी की वजह से अधिकतर योजनाओं का बजट खर्च नहीं हो पा रहा है। कम बजट पर प्रतिक्रिया के लिए कई बार संपर्क किया। लेकिन कोई जवाब नहीं दिया।
अवस्थापना एवं औद्योगिक विकास आयुक्त दीपक कुमार के पास काफी विभागों का बोझ है। इस वजह से न्याय नहीं कर पा रहे हैं। विभागीय अफसरों का कहना है कि आईआईडीसी महोदय निर्णय लेने में काफी वक्त लगाते हैं। इसके पीछे अहम वजह यह है कि अगर कोई फैसला करेंगे तो उसकी समीक्षा होगी। गले में फांस भी अटक सकता है। इस वजह से कोई भी फैसला लेने से कतराते हैं। जिसके कारण मुख्यमंत्री की महत्वकांक्षी योजनाएं प्रभावित हो रही हैं।
(आईएएस और मुख्य सचिव शशि प्रकाश गोयल की फोटो) जब से हार्ट अटैक का शिकार हुए मुख्य सचिव शशि प्रकाश गोयल तब से अपनी सेहत पर काफी फोकस कर रखा है। बहुत ही आवश्यक होने पर दिन में मात्र एक या दो मीटिंग करते हैं। बाकी दिन मोस्ट वीआईपी से ही मिलते हैं। मुख्य सचिव की निष्क्रियता के कारण मुख्यमंत्री की महत्वकांक्षी योजना बुरी तरह से प्रभावित हो रही हैं। 10 मार्च को सीएम समीक्षा बैठक में महत्वपूर्ण विभागों में तैनात अफसरों की कार्यप्रणाली की पोल खुल गई है। (UP Bureaucracy)
स्टेट ट्रांसफार्मेशन कमीशन के सीईओ मनोज कुमार सिंह ने कहा कि 10 मार्च को सीएम समीक्षा बैठक के बारे में आप जिम्मेदार अफसरों से पूछे। बस इस बैठक के बारे में यही बात सकता हूं कि मुख्यमंत्री ने अफसरों को निर्देशित किया है कि 17-18 मार्च को कम्पनियों का इंसेंटिव बांटने का निर्देश दिए गए हैं।
(UP Bureaucracy)
इ-पेपर : Divya Sandesh
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