Saturday, October 1, 2022
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    Lucknow mayor seat 2022 : दिसम्बर में प्रस्तावित हैं लखनऊ नगर निगम के चुनाव

    • ओबीसी हो सकती है लखनऊ मेयर की सीट!
    • लखनऊ की नगरीय सीमा में 88 गांव शामिल होने से गड़बड़ा सकते हैं समीकरण
    • निर्भय राज

    लखनऊ। Lucknow mayor seat 2022 आठ माह बाद यानी दिसम्बर माह में लखनऊ नगर निगम के चुनाव प्रस्तावित हैं। लेकिन इस बार लखनऊ नगर निगम की सीमा विस्तार के कारण कई समीकरण गड़बड़ा जाएंगे। आरक्षण की चक्रानुक्रम व्यवस्था के कारण इस बात की ज्यादा संभावना है कि न तो लखनऊ की मेयर महिला सीट आरक्षित हो सकेंगी और न ही सामान्य सीट घोषित होने की संभावना है। यानी आजादी के बाद पहली बार लखनऊ मेयर की सीट पिछड़ा वर्ग के खाते में जा सकती है। इसको लेकर राजनीतिक के दिग्गज खिलाडिय़ों में खूब मंथन हो रहा है और मेयर सीट पर शाह-मात के लिए शतरंज की चौसर पर चालें चली जा रही हैं।

    Lucknow mayor seat 2022 : 100 साल बाद पहली बार मिली लखनऊ को महिला मेयर

    Lucknow mayor
    Lucknow mayor sanyukta bhatia

    उल्लेखनीय है कि नगर निकाय के चुनाव पिछले बार 26 नवम्बर 2017 को चुनाव हुए थे। उस समय नगरीय सीमा के मतदाताओं की कुल संख्या 2443991 थी। 12 दिसम्बर 2022 को लखनऊ मेयर संयुक्ता भाटिया का कार्यकाल पूरा हो रहा है। लखनऊ को 100 साल बाद महिला मेयर के तौर पर संयुक्ता भाटिया मिली थी। लखनऊ की पहली महिला मेयर संयुक्ता भाटिया को 2 लाख 43 हजार 169 वोट मिले थे। सपा की मीरावर्धन को 1 लाख 58 हजार 974 वोट और कांग्रेस की प्रेमा अवस्थी 70 हजार 753 मत मिले थे। जबकि बसपा की बुलबुल गोदियाल 53 हजार 258 वोट के साथ चौथे स्थान पर रहीं थी।

    नगर निगम चुनाव को लेकर जनगणना की तैयारी शुरू

    lucknow mayor seat 2022
    जनगणना

    शासन ने नगर निगम चुनाव को लेकर जनगणना की तैयारी शुरू हो गई है। वार्डों के डिजिटल मैप बनाने का काम शुरू हो गया है। जनगणना 2021 में शहर की आबादी के साथ नगर निगम में सीमा में 88 नए गांव शामिल होने से वार्डों का दायरा भी बढ़ जाएगा। मौजूदा पार्षदों का कार्यकाल 12 दिसंबर को खत्म होने से पहले चुनाव होना है। 2011 के बाद 2021 में जनगणना का काम होना थाए जो कोरोना के चलते नहीं हो पाया।

    अभी तक चर्चा थी कि चुनाव तक जनगणना का काम नहीं हो पाएगा। ऐसे में कुछ वार्डों में जनगणना का सैंपल सर्वे के आधार पर आबादी का आकलन कर उसके आधार पर वार्डों का परिसीमन किया जाएगा। यह प्रक्रिया पूरी तरह से लागू होतीए उससे पहले केन्द्र की ओर से जनगणना कराने का आदेश जारी कर दिया गया। अब डिजिटल सिस्टम से जल्द यह काम कराने की योजना है। नगर निगम और जनगणना निदेशालय ने इसे लेकर काम शुरू कर दिया है।

    पिछली बार 2017 के चुनाव में वार्डों का परिसीमन किया गया था। अब इसके आधार पर नए 88 गांवों को जोड़ते हुए जनगणना निदेशालय और नगर निगम ने वार्डों के डिजिटल मैप बनाने का काम शुरू कर दिया है। 2017 के चुनाव में सभी 110 वार्डों का परिसीमन हुआ था। इसमें आबादी के हिसाब से सबसे छोटा वार्ड जोन एक का जेसी बोस रहा। इसकी आबादी 19,215 है। 34,352 के आंकड़े के साथ जोन तीन का जानकीपुरम द्वितीय सबसे बड़ा वार्ड है।

    ब्लॉक बनाने का काम भी शुरू

    जनगणना को लेकर हर वार्ड को कई ब्लॉक में बांटा जाता है। इसी आधार पर जनगणना के लिए कर्मचारी तैनात होते हैं। चूंकि नगर निगम में 88 गांव और शामिल हो गए हैंए ऐसे में वार्डों का परिसीमन भी किया जाएगा। इससे उनका दायरा भी बदल जाएगा। नए सिरे से ब्लॉक बनाने के लिए भी 2017 का रिकॉर्ड निकाला गया है। इससे देखा जा रहा है कि किस ब्लॉक में कितना क्षेत्रफल था और कौन-कौन से इलाके शामिल थे। अब इनमें कौन-कौन से नए इलाके जोड़े जा सकते हैं, इसे लेकर मंथन किया जा रहा है।

    पिछली जनणगना 2011 में नगर निगम सीमा की आबादी 28,17,105 थी। बीते दस सालों में इसमें करीब 20 प्रतिशत की वृद्धि मानी जा रही है। ऐसे में करीब छह लाख की आबादी नगर निगम की पुरानी सीमा में ही बढऩे का अनुमान है। इसी तरह नगर निगम सीमा में जो नए 88 गांव शामिल हुए हैं, उनकी आबादी भी तीन से चार लाख आंकी जा रही है। ऐसे में सभी 110 वार्डों में आठ से नौ हजार आबादी बढऩे का अनुमान है।

    सीमा विस्तार से गड़बड़ाए समीकरण

    लखनऊ नगर निगम की शहरी सीमा विस्तार में 88 गांव शामिल हुए हैं। ये गांव अधिकतर पिछड़ा वर्ग जनसंख्या बाहुल्य हैं। यही सबसे बड़ी वजह है कि आरक्षण की चक्रानुक्रम व्यवस्था के कारण कई समीकरण बदलने वाले हैं। पहली इस बात की संभावना ज्यादा है कि यह मेयर सीट महिलाओं के लिए आरक्षित नहीं रह पाएगी। साथ ही सामान्य से पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित हो सकती है।

    मेयर बनने के बाद कभी भी कोई चुनाव न जीतने का है अंधविश्वास

    इसे अंधविश्वास कहें या संयोग लेकिन जो भी यहां महापौर बना फिर कोई सीधा चुनाव नहीं जीता सका। पूर्व महापौर दाऊ जी गुप्ता करीब 21 साल तक महापौर रहे थे लेकिन वे लोकसभा का चुनाव नहीं जीत सके। बाद में वह एमएलसी बनकर सदन पहुंचे। यही नहीं डॉक्टर अखिलेश दास गुप्ता भी महापौर बनने के बाद लोकसभा चुनाव हारे। वे कांग्रेस सरकार में केंद्र मंत्री रहे पर इसके लिए उन्हें राज्यसभा का सहारा लेना पड़ा।

    डॉ पुरुषोत्तम दास कपूर महापौर बनने के बाद विधायक और सांसद का चुनाव लड़े लेकिन दोनों में ही उन्हें पराजय मिली। कैप्टन वीर मोहन ने भी महापौर बनने के बाद लोकसभा चुनाव लड़ा लेकिन जीत उन्हें हाथ नहीं लगी। डा. दिनेश शर्मा लखनऊ के दो बार मेयर रहे हैं और योगी सरकार के प्रथम कार्यकाल में उपमुख्यमंत्री रहे थे। भाजपा की 2022 के यूपी विधान सभा के चुनाव में लखनऊ की किसी एक सीट से लड़ाने तैयारी थी, लेकिन अंधविश्वास या संजोग के कारण चुनाव नहीं लड़े और उपमुख्यमंत्री के पद से भी हाथ धोना पड़ा।

    Lucknow mayor
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    बक्शी तालाब विधान सभा सीट के अनुसार पूर्व विधायक गोमती यादव का कहना है कि हमारी लम्बे समय से मांग रही है कि लखनऊ की सीट एससी या फिर ओबीसी घोषित की जाए और बैलेट से चुनाव हों। इसकी अहम वजह यह है कि 1990 से लेकर अब तक लखनऊ मेयर की सीट पर भाजपा का कब्जा रहा है। मौजूदा समय 88 गांव जुडऩे से लगभग 14 लाख दलित, मुस्लिम और ओबीसी मतदाताओं की संख्या है। अगर बैलेट से चुनाव हुए तो इस बार भाजपा के हाथ से सपा को लखनऊ नगर निगम के मेयर की सीट जा सकती है।

    Lucknow mayor seat 2022

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