उत्तर प्रदेश

ज्ञानवापी मस्जिद के सर्वे की लीक रिपोर्ट में हिंदू धार्मिक चिन्ह मिलने का जिक्र

gyanvapi mosque : वाराणसी। ज्ञानवापी मस्जिद परिसर का वीडियोग्राफी सर्वे करने के लिये नियुक्त दोनों एडवोकेट कमिश्नरों की अदालत में दाखिल की गयी रिपोर्टें अनौपचारिक रूप से सार्वजनिक हो गयी हैं, जिसमें मस्जिद के बाहरी हिस्से के साथ ही अंदरूनी इलाके में भी हिंदू धर्म से जुड़े चिन्ह और कलाकृतियां मिले हैं।

गुरुवार को विशेष एडवोकेट कमिश्नर विशाल सिंह ने (gyanvapi mosque) मस्जिद के अंदर तीन दिनों तक वीडियोग्राफी सर्वे किया था तथा अपनी रिपोर्ट अदालत में दाखिल की थी। सोशल मीडिया पर प्रचारित रिपोर्ट के अनुसार मस्जिद में स्थित तहखानों गुंबद और अन्य भागों में त्रिशूल, स्वास्तिक और स्पष्ट अभिलेख एवं धुंधली आकृतियां पायी गयीं। सर्वे टीम के कहने पर मस्जिद के विभिन्न तहखानों को खोला गया। पश्चिमी दीवार के विवादित स्थल पर हाथी की सूंड़ की टूटी हुयी कलाकृतियां और दीवार के पत्थरों पर स्वास्तिक, त्रिशूल और पान के चिन्ह की अनेक कलाकृतियां उकेरी हुयी हैं। रिपोर्ट के अनुसार मस्जिद के प्रथम गेट के पास तीन डमरू जैसे चिन्ह दिखाई देने की बात वादी पक्ष की ओर से की गयी। इसकी भी फोटोग्राफी करायी गयी।

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इसके साथ ही कुछ दीवारों पर घंटियों की कलाकृतियां भी खुदी पाायी गयी हैं। रिपोर्ट के अनुसार, “ये सब कलाकृतियां प्राचीन भारतीय मंदिर शैली के रूप में प्रतीत होती हैं। ये काफी पुरानी है और इनमें से कुछ कलाकृतियां टूट गयी हैं।”

रिपोर्ट में कहा गया है कि मस्जिद के तीसरे गुंबद की ओर जाने वाले रास्ते पर एक पत्थर पाया गया जिस पर फूल, पत्तियां और कमल की आकृतियां मिली हैं। इन तीनों बाहरी गुंबदों के नीचे पायी गयी तीन शंकुकार शिखरनुमा आकृतियों को वादी पक्ष ने प्राचीन मंदिर शिखर बताया जबकि प्रतिवादी ने इसका विरोध किया। रिपोर्ट के मुताबिक मस्जिद की बड़ी मीनार के नीचे की सीढ़ी के बगल में खुदी मिली कुछ पंक्तियों को वादी पक्ष ने मंत्र बताया जबकि प्रतिवादी पक्ष ने इसे भ्रामक बताया। सर्वे दल ने कहा कि इन पंक्तियों को किसी भाषाविद द्वारा जांच कराकर स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

सर्वे टीम ने 18वीं शताबदी के अंग्रेज विद्वान जेम्स प्रिंसप और नामचीन इतिहासकार ए एच अल्टेकर की पुस्तकों के नक्शों और ब्योरे का मिलान परिसर में मिले अवशेषाें एवं आकृतियों के साथ किया। रिपोर्ट के अनुसार, “पुस्तक में उल्लिखित फोटाेकाॅपी नक्शे से दीवारों के आकार प्रकार का मिलान करने पर पाया गया कि दोनों में पूरी समानता है। हालांकि उपरोक्त तथ्यों की सत्यता की जांच किसी ख्यातिप्राप्त इतिहासकार के द्वारा कराया जाना उचित है। अंदर की दीवारों की कलाकृतियों व प्रतीक चिन्हों तथा उसकी बनावट कुछ कुछ प्राचीन भारतीय शैली जैसी प्रतीत होती है।”

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सर्वे दल ने मस्जिद के वजूखाने की भी छानबीन की। सर्वे के अंतिम दिन मस्जिद के वजूखाने की छानबीन की गयी। वादी पक्ष के अधिवक्ता द्वारा सर्वे दल का ध्यान आकृष्ट कराया गया कि इस कुंड के बीचों बीच शिवलिंग है। सर्वे दल ने मस्जिद के बाहर स्थित नंदी से कुंड तक की दूरी नापी जो कि 83.3 फीट पायी गयी। गहन सर्वे के लिये वजूखाने का पानी कम कराया गया तो लगभग ढाई फीट ऊंची काली गोलाकार आकृति दिखी। इसके ऊपरी हिस्से पर कटा हुआ गोलाकार डिजाइन का अलग सफेद पत्थर दिखाई पड़ा जिसके बीचों बीच करीब आधे इंच का गोल छेद था जिसमें सींक डालने पर गहराई 63 सेंमी पायी गयी। इसके आधार (बेस) का व्यास लगभग चार फुट पाया गया।

सर्वे रिपोर्ट के अनुसार वादी गण के अधिवक्ता इस गोलाकार काले पत्थर को शिवलिंग कहने लगे, जबकि मस्जिद पक्ष की आेर से कहा गया कि यह फव्वारा है। (gyanvapi mosque) सर्वे दल की ओर से मस्जिद प्रबंधन से पूछा गया कि फव्वारा कब से बंद है तो जवाब में पहले 20 वर्ष और फिर 12 वर्ष की अवधि बतायी गयी। वादी पक्ष ने फव्वारा चालू कराने की मांग की, इस पर मस्जिद प्रबंधन ने असमर्थता जतायी।

सर्वे दल ने कुंड के अंदर स्थित गोलाकार पत्थर के बारे में और जानकारी हासिल करने में कठिनायी का भी जिक्र किया। रिपोर्ट के अनुसार “इस गोलाकार आकृति के नीचे जमीन तक पहुंचना संभव नहीं है। इसके नीचे जमीन का हिस्सा उत्तर व दक्षिण के तहखाने की दीवारों और पूर्व में तालाब की नीचे की दीवार से घिरा है। अत: इस स्थल पर दीवारों के अवरोध की वजह से कमीशन की कार्रवाई वर्तमान में पूर्ण करना संभव नहीं हाे पाया।” मस्जिद के वजूखाने में शिवलिंग बनाम फव्वारा विवाद के संबंध में सर्वे रिपोर्ट में कहा गया कि आसपास की दीवारों के कारण नीचे जाना संभव नहीं है। इस कारण इस बिंदु पर सर्वे भी नहीं हो सका।


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NDS Desk

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