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Dalit Politics: भाजपा के वाल्मीकि वोट बैंक में सेंध लगाएंगी रोहिणी घावरी!

दलित राजनीति में नई रार: 'जाटव बनाम गैर-जाटव' की रस्साकशी 2027 में बदलेगी समीकरण

  • Dalit Politics
  • अखिलेश यादव का रोहिणी घावरी को परोक्ष समर्थन भाजपा के सबसे मजबूत गैर-जाटव दुर्ग में लगा सकता है सेंध
  • पश्चिमी यूपी की 21 सीटों पर नया सियासी दांव

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है। राज्य की करीब 21 फीसदी अनुसूचित जाति आबादी के बीच ‘जाटव बनाम गैर-जाटव’ का अंतर्विरोध अब खुलकर चुनावी अखाड़े में उतर आया है। स्विट्जरलैंड से लौटीं वाल्मीकि समाज की सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. रोहिणी घावरी की सियासी सक्रियता, नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ उनका सीधा कानूनी मोर्चा और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव का उन्हें मिल रहा परोक्ष सहयोग प्रदेश की राजनीति को नया मोड़ दे रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि अखिलेश यादव रोहिणी घावरी के जरिए वाल्मीकि समाज को साधने में सफल रहे, तो इसका सबसे गंभीर और प्रतिकूल असर सीधे तौर पर भारतीय जनता पार्टी पर पड़ेगा, जिसका दशकों से इस समाज पर लगभग एकतरफा सियासी दबदबा रहा है।

​सपा प्रमुख अखिलेश यादव अपने ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद और अधिक व्यापक व आक्रामक बनाने में जुटे हैं। अभी तक सपा का दलित आधार मुख्य रूप से पासी समाज या कुछ हद तक जाटव मतदाताओं तक सीमित दिख रहा था, जबकि वाल्मीकि, कोरी और खटीक जैसी गैर-जाटव जातियां भाजपा की अभेद्य ढाल बनी हुई थीं। ऐसे में रोहिणी घावरी को अखिलेश यादव का समर्थन मिलना भाजपा के लिए दोतरफा संकट खड़ा करता है। वाल्मीकि समाज पारंपरिक रूप से भाजपा का वफादार और अनुशासित वोटर रहा है। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों तथा 2019 व 2024 के लोकसभा चुनावों में इस समाज से चुनकर आने वाले सभी प्रमुख चेहरे (राजवीर दिलेर, अनूप प्रधान वाल्मीकि, सुरेंद्र दिलेर) भाजपा के ही रहे हैं। यदि सपा के मंच और संसाधनों की ताकत रोहिणी घावरी के पीछे लगती है, तो वाल्मीकि समाज में ‘स्वाभिमान और हक’ के नाम पर भाजपा विरोधी लहर को हवा मिल सकती है।

​मेरठ, गाजियाबाद, आगरा, अलीगढ़ और सहारनपुर बेल्ट की 21 से अधिक सीटों पर वाल्मीकि मतदाता 20,000 से 45,000 तक हैं। इन शहरी व अर्ध-शहरी सीटों पर भाजपा की जीत-हार का अंतर अमूमन 2,000 से 8,000 वोटों का ही रहता है। सपा-कांग्रेस गठबंधन के साथ मुस्लिम-यादव-जाटव का एक हिस्सा पहले से है; ऐसे में यदि वाल्मीकि समाज का 10 से 20 प्रतिशत वोट भी सपा की तरफ खिसका, तो भाजपा के लिए अपनी जीती हुई दर्जनभर सीटें बचाना बेहद मुश्किल हो जाएगा। रोहिणी घावरी ने आरक्षित सीटों में 30 फीसदी हिस्सेदारी वाल्मीकि समाज को देने की मांग रखी है। अखिलेश यादव यदि सपा के टिकट वितरण में वाल्मीकि समाज को दो-चार अतिरिक्त सीटों पर प्राथमिकता देने का संकेत भी दे देते हैं, तो भाजपा पर अपने टिकट बंटवारे में वाल्मीकियों को बड़ी हिस्सेदारी देने का भारी दबाव बनेगा। ऐसा करने पर भाजपा के अन्य गैर-जाटव सहयोगी (जैसे पासी या कोरी) असंतुष्ट हो सकते हैं, और न करने पर ‘वाल्मीकि उपेक्षा’ का नैरेटिव भाजपा के खिलाफ मजबूत होगा। (Dalit Politics)

अखिलेश यादव के लिए रोहिणी घावरी का समर्थन दोहरा राजनीतिक फायदा लेकर आया है। एक तरफ वे भाजपा के सबसे मजबूत गैर-जाटव वोट बैंक में सेंध लगा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ वे पश्चिमी यूपी में तेजी से पैर पसार रहे नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद की ‘सर्व-दलित’ नेता वाली छवि पर भी लगाम कस रहे हैं। ​पश्चिमी उत्तर प्रदेश और ब्रज क्षेत्र की करीब दो दर्जन सीटों पर वाल्मीकि समाज का वोट किसी भी गठबंधन के लिए जीत-हार का फैसला करता है।

​हाथरस-अलीगढ़ बेल्ट (खैर और इगलास) यह क्षेत्र वाल्मीकि राजनीति की धुरी है। खैर (सुरक्षित) से अनूप प्रधान वाल्मीकि मंत्री रहे और फिर हाथरस से सांसद बने, जबकि खैर उपचुनाव में भाजपा के सुरेंद्र दिलेर जीते। इगलास में भी 30 हजार से अधिक वाल्मीकि मतदाता निर्णायक भूमिका में रहते हैं। आगरा कैंट, मेरठ शहर, मेरठ कैंट, लोनी, गाजियाबाद, फिरोजाबाद के अलावा कानपुर की सीसामऊ और किदवई नगर सीटों पर वाल्मीकि समाज की सघन आबादी है। सफाई कर्मचारी संगठनों और स्थानीय वाल्मीकि पंचायतों का रुख मतदान की दिशा तय करने में बेहद असरदार साबित होता है। (Dalit Politics)

रोहिणी घावरी द्वारा लगाए गए कानूनी व व्यक्तिगत आरोपों से चंद्रशेखर की समूचे दलित समाज का निर्विवाद युवा नेता बनने की मुहिम को बड़ा झटका लगा है। गैर-जाटव समाज में यह संदेश गहराने का खतरा है कि उनकी राजनीति सिर्फ एक जाति विशेष (जाटव) तक सीमित है। राज्य के दलितों में जाटव करीब 54 फीसदी और गैर-जाटव 46 फीसदी हैं। गैर-जाटव जातियों के पूरी तरह दूरी बना लेने और चंद्रशेखर व सपा के उभार से बसपा के लिए अपनी पारंपरिक जमीन बचाना अस्तित्व की लड़ाई बन गया है। उत्तर प्रदेश की 84 सुरक्षित सीटों पर अब मुकाबला सीधा न रहकर बहुकोणीय होने जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के आरक्षण में उप-वर्गीकरण के फैसले के बीच, सपा के समर्थन से वाल्मीकि समाज का स्वतंत्र और मुखर उभार 2027 के चुनाव में सत्ताधारी भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग के सामने अब तक की सबसे बड़ी और अप्रत्याशित चुनौती पेश कर रहा है।

Dalit Politics

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