UP Bureaucracy: लखनऊ। उत्तर प्रदेश में सरकार किसी भी राजनीतिक दल की रही हो, लेकिन अपने खास आईएएस, पीसीएस, आईपीएस और न्यायिक सेवा के अफसरों को सेवानिवृत्त होने के बाद भी जनहित में उनकी योग्यताओं को उपयोग करने के लिए किसी न किसी सरकारी अर्धसरकारी विभागों में पुर्ननियोजन करती है। योगी सरकार में ऐसे सैकड़ों अधिकारी हैं जिनको किसी न किसी विभाग में समायोजन कर रखा है। सरकार के इन खास अफसरों के खिलाफ अक्सर कोई न कोई विवाद मीडिया में छाया रहता है। इसके बावजूद सरकार की मेहरबानी खत्म नहीं होती है।
विवादों का साया
Retired IAS Avneesh Awasthi
सरकार के सबसे खास आईएएस अफसर अवनीश कुमार अवस्थी 31 अगस्त 2022 को सेवानिवृत्त होने के लगभग 15 दिन बाद मुख्यमंत्री के सलाहकार बनाए गए। उनके कार्यकाल को कई बार बढ़ाया गया और वे 2027 तक सलाहकार बने रहने वाले हैं। जबकि अवनीश कुमार अवस्थी की कार्यप्रणाली को लेकर कई बार बंवडर उठा। नैनीताल के कथित 50 करोड़ की चोरी का मामला रहा हो, या फिर सरकारी बंगला और सुरक्षा का मामला रहा हो। इससे पूर्व अपनी पत्नी को सरकारी सहयोग दिलाने के कई प्रकरण खूब चर्चा में रहे। कान फूंकने की कला के माहिर होने के कारण सरकार के आज भी विश्वास पात्र बने हुए हैं।
Retired IAS Manoj Kumar Singh
पूर्व मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह अपने बोल्ड और विवादित फैसलों के लिए काफी सुर्खियां बटोरी। सेवा विस्तार के लिए खूब पसीना बनाया। जब सेवा विस्तार नहीं मिला तो यूपी की नौकरशाही को लगा अब उनकी वापसी नहीं होगी। सरकार ने पद से सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें राज्य परिवर्तन आयोग के सीईओ नियुक्त किए गए।
Principle Of Secratary Pradeep Dubey
लम्बे से समय प्रमुख सचिव विधान सभा की कुर्सी संभालने का रिकार्ड बनाने और कई विधान सभा अध्यक्षों के कार्यकाल में आमूल-चूल क्रांतिकारी परिवतर्न करने वाले कानूनविद् प्रदीप दुबे इन दिनों सुर्खियों में हैं। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती, अखिलेश यादव और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दूसरे कार्यकाल में प्रमुख सचिव के पद पर कार्यरत हैं। लम्बी नियुक्ति के कार्यकाल का मामला छोड़ दिया जाए तो कोई ऐसा विवाद नहीं है, जिससे सरकार उनकी सेवाओं से मुंह मोड़ सके। अभी उनके लम्बे कार्यकाल को लेकर हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है।
लम्बी फेहरिश्त हैं रिटायर्ड अफसरों के समायोजन की लिस्ट
इस तरह के लोगों की लम्बी फेहरिस्त है, जिनको रिटायरमेंट के बाद सरकार ने जनहित में उनकी सेवाएं ली हैं। विधान परिषद के प्रमुख सचिव राजेश सिंह, प्रमुख सचिव संसदीय कार्य जे.पी. सिंह, 75 वर्षीय कृष्ण गोपाल गृह-गोपन, वित्त विभाग में नील रतन, रेरा में पूर्व आईएएस अबरार अहमद, पूर्व आईएएस डिम्पल वर्मा, पूर्व आईएएस अरविंद कुमार उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग के अध्यक्ष, पूर्व आईएएस राज प्रताप सिंह को राज्य निर्वाचन आयोग का आयुक्त, पूर्व आईएएस मुकुल सिंघल को उत्तर प्रदेश राज्य सहकारी समिति निर्वाचन आयोग का अध्यक्ष, पूर्व आईएएस डा. सुधीर एम. बोबड़े को राज्यपाल का ओएसडी, प्रमोटी आईएएस डा. अखिलेश कुमार मिश्रा को राज्य निर्वाचन आयोग में अतिरिक्त राज्य निर्वाचन आयुक्त, पूर्व आईएएस संजय भूसरेड्डी को रेरा का अध्यक्ष, पूर्व मुख्य सचिव दुर्गा शंकर मिश्र को जनसंख्यिकी परिवर्तन के लिए बनी हाई लेवल कमेटी का सदस्य, पूर्व डीजीपी प्रशांत कुमार को उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग का अध्यक्ष और राज्य लोक सेवा अधिकरण में पूर्व आईएएस योगेश्वर राम मिश्र, पूर्व आईएएस के. रवीन्द्र नायक, पूर्व आईएएस सुख लाल भारती, पूर्व आईएएस आनंद कुमार सिंह, डा. अनिल कुमार सिंह, डा. अनिल कुमार को नियुक्त किया गया है।
ये हैं सेवा विस्तार और पुर्ननियुक्ति के नियम
सेवा विस्तार : अधिकारी की सेवानिवृत्ति की तिथि आगे बढ़ा दी जाए। पुनर्नियुक्त/संविदा नियुक्ति अधिकारी सेवानिवृत्त हो चुका हो और उसे किसी आयोग, प्राधिकरण, सलाहकार या विशेष पद पर दोबारा नियुक्त किया जाए। अधिकारियों के लिए सामान्य सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष है। सेवा में रहते हुए विस्तार देना अपवादस्वरूप होता है और इसके लिए सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी आवश्यक होती है। (UP Bureaucracy)
उत्तर प्रदेश में जो मामले अधिक दिखाई देते हैं, जैसे अवनीश कुमार अवस्थी को मुख्यमंत्री का सलाहकार बनाना या मनोज कुमार सिंह को राज्य परिवर्तन आयोग का सीईओ बनाना प्राय: पुनर्नियुक्त/संविदा नियुक्ति की श्रेणी में आते हैं, न कि नियमित सेवा में सेवा विस्तार की। सामान्यत: ऐसी नियुक्तियों के लिए निम्न शर्तें लागू होती हैं। सृजन या पद का अस्तित्व शासनादेश से होना चाहिए।
नियुक्ति राज्य सरकार/मंत्रिपरिषद की स्वीकृति से होती है। नियुक्ति निश्चित अवधि जैसे 1 वर्ष, 2 वर्ष, 3 वर्ष के लिए की जाती है। कार्यकाल बढ़ाया जा सकता है यदि सरकार संतुष्ट हो। वेतन/मानदेय अलग आदेश से निर्धारित किया जाता है, कई मामलों में पेंशन को समायोजित करके भुगतान किया जाता है।
नियुक्त व्यक्ति नियमित कैडर पोस्ट पर नहीं बल्कि सलाहकार, आयोग अध्यक्ष, सदस्य या विशेष कार्याधिकारी जैसे पद पर कार्य करता है। यूपी में ऐसा कोई एक सार्वभौमिक नियम नहीं है कि हर रिटायर्ड को स्वत: विस्तार मिल सकता है। प्रत्येक नियुक्ति अलग शासनादेश, विभागीय प्रस्ताव और सरकार की स्वीकृति के आधार पर होती है।