पकौड़ी और दिव्या बिगड़ेंगे अनुप्रिया का सियासी गणित!

लखनऊ. विंध्य क्षेत्र और विशेष रूप से मिर्जापुर में अपना दल (सोनेलाल) के राजनीतिक आधार को पूर्व सांसद पकौड़ी लाल कोल और पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल के नए राजनीतिक दलों के गठन से नई चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में मिर्जापुर की सभी पांचों विधानसभा सीटों पर एनडीए ने क्लीन स्वीप किया था। हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में जीत का अंतर घटकर महज 37,810 वोट रह जाने और रॉबर्ट्सगंज सीट पर मिली करारी हार के बाद क्षेत्र के सियासी समीकरण काफी संवेदनशील हो चुके हैं। इस नाजुक मोड़ पर उभरे दो नए दलों ने सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए चुनावी राह को और पेचीदा बना दिया है।
कोल मतों में बिखराव की आशंका
रॉबर्ट्सगंज के पूर्व सांसद पकौड़ी लाल कोल ने अपना दल (एस) से अलग होकर ‘विंध्य समता समाज पार्टी’ की कमान संभाल ली है। विंध्य क्षेत्र के पठारी इलाकों, खासकर छानबे और मड़िहान में कोल समुदाय की आबादी चुनावी दृष्टि से बेहद निर्णायक मानी जाती है। वर्ष 2024 के आम चुनाव में टिकट कटने के बाद से पकौड़ी लाल असंतुष्ट चल रहे थे, जबकि उनकी पुत्रवधू रिंकी कोल वर्तमान में छानबे विधानसभा सीट से अपना दल (एस) की विधायक हैं। यदि पकौड़ी लाल कोल अपने पारंपरिक कोल जनाधार में सेंध लगाने में सफल होते हैं, तो इसका सीधा असर इस सुरक्षित सीट के साथ-साथ सीमावर्ती ग्रामीण इलाकों के चुनावी नतीजों पर पड़ सकता है।
प्रशासनिक साख और शहरी-कायस्थ मतों का गणित
दूसरी ओर, भारतीय प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा देकर दिव्या मित्तल ने ‘जननीति भारत’ नाम से दल का गठन किया है और मिर्जापुर सदर विधानसभा सीट समेत अन्य क्षेत्रों में प्रत्याशी उतारने का ऐलान किया है। मिर्जापुर में जिलाधिकारी रहते हुए सुदूर पहाड़ी गांवों तक पाइपलाइन से पेयजल पहुंचाने और सख्त प्रशासनिक छवि के कारण आम जनता में उनका सकारात्मक प्रभाव रहा है। प्रशासनिक लोकप्रियता के अलावा मिर्जापुर सदर विधानसभा क्षेत्र के जातीय समीकरण भी इस मुकाबले को दिलचस्प बना रहे हैं। मिर्जापुर नगर क्षेत्र में प्रबुद्ध व शिक्षित वर्ग के साथ-साथ कायस्थ और वैश्य मतदाताओं की उल्लेखनीय मौजूदगी है, जो पारंपरिक रूप से भाजपा और एनडीए का मजबूत आधार वोट बैंक रहे हैं। जानकारों के मुताबिक, हालांकि कायस्थ समाज की संख्या जिले के समग्र ग्रामीण परिदृश्य में सीमित है, लेकिन सदर (नगर) सीट पर यह संभ्रांत और निर्णायक तबका माना जाता है। यदि दिव्या मित्तल अपनी प्रशासनिक साख और सजातीय जुड़ाव के सहारे कायस्थ व शहरी मतदाताओं के एक हिस्से को भी अपने पाले में खींचने में कामयाब रहती हैं, तो इसका सीधा नुकसान सत्तारूढ़ गठबंधन को झेलना पड़ सकता है।
दो अलग ध्रुवों से घेराबंदी का सियासी गणित
सियासी जानकारों के अनुसार, इन दोनों नेताओं की कार्यशैली, लक्षित मतदाता और प्रभाव क्षेत्र एक-दूसरे से पूरी तरह भिन्न हैं, जिससे एनडीए के सामने दोतरफा दबाव बनता दिख रहा है। एक तरफ जहां पकौड़ी लाल कोल का मुख्य दायरा छानबे, मड़िहान और सोनभद्र से सटे ग्रामीण इलाकों तक सीमित है, वहीं वे सीधे तौर पर अपना दल (एस) के पारंपरिक सामाजिक गठबंधन और कोल वोट बैंक को निशाना बना रहे हैं। दूसरी ओर, दिव्या मित्तल का प्रभाव मिर्जापुर सदर व कस्बाई इलाकों में अधिक माना जा रहा है, जहां वे कायस्थ, वैश्य, युवा और सत्ता-विरोधी तटस्थ मतों को अपनी ओर खींचने की कोशिश में हैं। इस प्रकार ग्रामीण अंचल में पारंपरिक जनाधार का बिखराव और शहरी क्षेत्र में प्रबुद्ध व सजातीय मतों का बंटवारा, दोनों मिलकर सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए चुनावी गणित को कठिन बना सकते हैं।
बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने में जुटा अपना दल (एस)
इन नई राजनीतिक चुनौतियों को देखते हुए अपना दल (एस) ने भी जवाबी तैयारी तेज कर दी है। पार्टी ने बूथ स्तर से लेकर जिला स्तर तक संगठन की समीक्षा शुरू कर दी है और ग्रामीण इलाकों में घर-घर संपर्क अभियान चलाया जा रहा है। चुनावी रणनीति को मजबूत करने के लिए 2 नवंबर को लखनऊ में पार्टी पदाधिकारियों और एनडीए के प्रमुख नेताओं की एक महत्वपूर्ण संगठनात्मक बैठक भी बुलाई गई है।
“लोकतंत्र में सभी को राजनीतिक दल बनाने और चुनाव लड़ने का अधिकार है। पकौड़ी लाल कोल को पहले ही पार्टी से निलंबित किया जा चुका है। एनडीए और अपना दल (एस) का जनाधार पूरी तरह एकजुट है और इन घटनाक्रमों से संगठन को कोई नुकसान नहीं होगा। आगामी चुनावों में जनता खुद स्थिति साफ कर देगी।“
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