यूपी ब्यूरोक्रेसी की ‘डेढ़ इश्किया फाइलें’!
UP Bureaucracy: लखनऊ। ‘इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते’—यह फलसफा सूबे की नौकरशाही की फाइलों पर मुहर की तरह चस्पा है। सरकारें आईं, गईं, झंडे और एजेंडे बदले, लेकिन साहबों की ‘रंगीन टेबल-टॉक’ का जलवा कभी मंदा नहीं पड़ा। फाइलों पर ‘कृपया परीक्षण करें’ लिखने वाली कलम शाम ढलते ही जब जाम और हुस्न की इबादत में डूबती है, तो नीति-निर्धारण के मायने ही बदल जाते हैं। लालबत्ती की आड़ में चलने वाली इन रूमानी अठखेलियों से हुकूमत की पगड़ी भले कई बार उछली हो, मगर साहबों के मलाईदार ठिकानों पर कभी आंच नहीं आई। चाय की टपरी से लेकर एनेक्सी के गलियारों तक तैर रहे कुछ ऐसे ही ‘रसिया अफसरों’ के अनसुलझे, चटपटे किस्से:
‘एसपी सर’ का गंगाजल

मॉडल श्रद्धा दुबे वाले कांड में खाकी भले सुरागों की खाक छान रही हो, मगर महकमे की सारी निगाहें एक कद्दावर ‘एसपी सर’ के कारनामों पर टिकी हैं। साहब का प्रशासनिक मंत्र बेहद पारदर्शी है—जाम छलकता रहे और सोहबत में हुस्न की महक हो, फिर महफिल वीआईपी गेस्ट हाउस में जमे या किसी बेनामी फार्म हाउस पर, इससे क्या फर्क पड़ता है! अब जब अपने ही बैचमेट बोटियां तोड़ते-तोड़ते साहब के रंगीन किस्सों का रायता पूरे शहर में फैला रहे हैं, तो ‘एसपी सर’ अचानक गंगाजल छिड़ककर खुद को ‘तपस्वी’ सिद्ध करने की मशक्कत में हैं। लेकिन लखनवी हवाएं भी मुस्कुरा रही हैं—साहब, बगुला जब-जब एक टांग पर खड़े होकर ध्यान लगाता है, नीयत किसी मछली पर ही होती है!
‘एसपीजी’ के दिल पर ब्रेक

नौकरशाही के गलियारों में ‘एसपीजी’ कोडनेम वाले साहब का दिल बड़ा नाज़ुक निकला—जब-जब लगा, सीधे दुर्घटनाग्रस्त हुआ। सीएसआई के 8वें माले पर विग वाले बैचमेट के संग जो रूमानी हवाएं चली थीं, उन पर पहला ब्रेक एक गुमनाम चिट्ठी ने लगाया, जिसने साहब के चाल-चलन की पूरी एक्स-रे रिपोर्ट चौराहे पर टांग दी। दिल अभी इस झटके से संभल ही रहा था कि दिल्ली की आबोहवा में दूसरा झटका इनके जेहन में ऐसा ‘अंकित’ हुआ कि आशिकी की बुलेट ट्रेन पटरी से ही उतर गई। नतीजे में साहब ने खुद ही अपनी रंगीन मिजाजी पर इमरजेंसी ब्रेक खींच लिया और अब बड़े ‘संयमी’ बने घूम रहे हैं।
‘डेविल’ की निगाहें और फाइलें

बाग-बगीचे और जमीन-जायदाद के सबसे रसूखदार दफ्तरों में एक साहब महिला कर्मचारियों के बीच बाकायदा ‘डेविल’ के नाम से पूजे (यानी कोसे) जाते हैं। घरेलू कलह की तपिश दिमाग पर ऐसी चढ़ी कि साहब की रूह चौबीसों घंटे अतृप्त रहने लगी। साहब का ‘प्रशासनिक प्रेम-जाल’ बड़ा क्लासिक रहा—सुंदर मातहतों पर फाइलों का इतना भारी बोझ लाद दो कि वो हलकान हो जाएं, और फिर ‘निजी मार्गदर्शन’ के नाम पर बाहें फैला दो! चीख-पुकार मची, बगावत की आंच सीधे मुखिया के दरबार तक भी पहुंची, मगर मलाईदार कुर्सियों का सुरक्षा कवच ऐसा रहा कि साहब का बाल भी बांका न हुआ। आज भी यह अतृप्त आत्मा नई शिकारगाह की तलाश में सरकारी फाइलों के पन्ने पलट रही है।
रिटायर ‘वुमेन किलर’ का पार्क-योगा

जमीन महकमे से हाल ही में रुखसत हुए साहब को पूरी ब्यूरोक्रेसी में ‘वुमेन किलर’ का तमगा हासिल था। हुस्न की ऐसी अखंड इबादत की कि दिन-रात की रंगीनियों का असर अब बदन पर चितकबरेपन की शक्ल में साफ गवाही देता है। लेकिन रिटायरमेंट के बाद भी साहब के भीतर का मजनू पेंशन लेने को तैयार नहीं। आजकल सुबह-शाम ढलते ही लोहिया पार्क और गोमती रिवर फ्रंट पर टहलने वाली महिलाओं को जबरन रोककर ‘लंबी सांसें लेने’ और ‘मेडिटेशन’ का रूमानी पाठ पढ़ाते दिख जाते हैं। कुर्सी छिन गई तो क्या हुआ, हुस्न के भले के लिए समाज सेवा तो जारी रहनी ही चाहिए!
‘महिला सशक्तिकरण’ के स्वयंभू मजनूं

सिंचाई विभाग के इन साहब के भीतर महिला सशक्तिकरण का भूत ऐसा जागा कि पूरे महकमे में इश्किया बाढ़ आ गई। साहब का मानना है कि सृष्टि की हर खूबसूरत नारी का उद्धार केवल उनके दफ्तर के सोफे से ही मुमकिन है। इस चक्कर में ‘एक हसीना को बाय-बाय, दूजी को हाय-हाय’ का ऐसा रोग लगा कि घर का सुकून राख हो गया और बीवी के बेलन से बचने के रास्ते खोजने पड़े। मगर साहब आज भी सीना तानकर डटे हैं—आखिर हुस्न की खिदमत भी तो एक किस्म का राष्ट्रीय कर्तव्य ही है!
हसीन टूरिज्म डायरी

पशुपालन वाले साहब भी नारी उत्थान के इस पुण्य काम में पीछे नहीं रहे। जब टूरिज्म की कमान हाथ में थी, तो उन्होंने पर्यटन को इतना ‘व्यक्तिगत और रूमानी’ बना दिया कि हर प्रोजेक्ट में सिर्फ हुस्न के फव्वारे छूटने लगे। टूरिज्म के नाम पर सजी इन हसीन महफिलों की मदहोश खुशबू जब सीधे मंत्री जी के केबिन का एसी चीरती हुई पहुंची, तो हुकूमत ने आनन-फानन में साहब के इस ‘अति-रोमांटिक सशक्तिकरण’ पर ताला जड़ दिया। साहब कुर्सी से विदा कर दिए गए, मगर दिल की टूरिस्ट डायरी में आज भी कई हसीन मुकाम महक रहे हैं।
अमृत काल में कलयुगी ‘शाहजहां’ का अवतार

अमृत काल में एक ‘अमृत’ साहब की इश्किया दास्तानें सीधे मुग़लिया दौर की याद दिलाती हैं। हुस्न के ऐसे कद्रदान कि नोएडा में अपनी चहेती अप्सरा को आशियाना थमाकर खुद को कलयुग का शाहजहां मान बैठे। नगर के बुनियादी विकास को छोड़कर जब साहब सिर्फ नारियों के ‘व्यक्तिगत विकास’ पर दिन-रात फाइलें दौड़ाने लगे, तो सूबे के मुखिया ने चाबुक चलाया और इनका तबादला सीधे धर्म-कर्म वाले महकमे में कर दिया—ताकि मंदिरों के घंटे बजाते रहें और हुस्न का यह अमृत थोड़ा उतर सके।
बूढ़ा शेर की पुरानी दहाड़

नौकरशाही के कभी बेताज बादशाह रहे साहब इन दिनों ‘परिवर्तन’ का चोला ओढ़कर मैदान में हैं। जब कार्यकाल विस्तार की फाइल खारिज हुई, तो विरोधियों ने मान लिया था कि साहब का खेल खत्म हो चुका है। मगर साहब ‘फीनिक्स’ पंछी की तरह राख से उठ खड़े हुए—और वापसी भी ऐसी धमाकेदार कि बूढ़े शेर के हरम की पुरानी शेरनियां भी फिर से पूरे शबाब और रंगत में लौट आईं! हाथी वाली सरकार के दौर में साहब की रंगीनियों के जो छींटे उड़े थे, वो दाग आज तक किसी डिटर्जेंट से नहीं धुले। उम्र ने रफ्तार जरूर धीमी की है, मगर सियासत और महकमे के बाशिंदे खूब जानते हैं—शेर चाहे कितना भी बूढ़ा हो जाए, शिकार की खुशबू मिलते ही उसकी मूंछें फड़कने लगती हैं!
आशिकी के इस दंगल विदुषी देवियां भी पीछे नहीं

साहबों के किस्से तो बहुत सुने, लेकिन ज़रा ठहरिए! ऐसा बिल्कुल मत समझिएगा कि आशिकी के इस दंगल में सिर्फ ‘पुरुष शूरवीरों’ ने ही तीर मारे हैं। हमारी नौकरशाही की विदुषी देवियां भी इस हुनर में किसी से कम 21 नहीं रहीं! एक दौर था जब महकमे में एक ऐसी ‘सुगंधित’ मैडम का जलवा था कि उनके गलियारे से गुजरते ही फाइलें महक उठती थीं और साहबों का बीपी मचल उठता था। इधर पतिदेव जेल की हवा खाकर कानून का ‘अध्ययन’ कर रहे थे, और उधर मैडम की महफिल में इत्र की बयार बह रही थी। नेताजी हों या सीनियर अफसर, सब उस खुशबू के पीछे ऐसे लहालोट रहते थे जैसे फूल पर मंडराते बावरे भंवरे! और हद तो तब हो गई जब एक जिले की कमान संभाल रहीं मैडम कलेक्टर के दिल की सरहद लांघने के लिए आशिकों में बाकायदा महाभारत छिड़ गया। प्यार का बुखार इस कदर सिर चढ़कर बोला कि साहबों के लंबरदार आपस में ही तमंचे तान बैठे और धायं-धायं गोलीबारी हो गई!
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